चुनावी मौसम में मुफ्त की होड़

Published at :11 Mar 2014 5:30 AM (IST)
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चुनावी मौसम में मुफ्त की होड़

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।। अर्थशास्त्री चुनाव के समय हर पार्टी वोटर को लुभाने में लगी है, परंतु संकेत हैं कि मुफ्त वितरण करके वोट पाने की कांग्रेस की पाॉलिसी सफल नहीं है. अत: पानी, बिजली, फर्टिलाइजर आदि मुफ्त देने के स्थान पर क्रास-सब्सिडी की पॉलिसी अपनानी चाहिए. आम आदमी पार्टी की अल्प समय की […]

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।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।

अर्थशास्त्री

चुनाव के समय हर पार्टी वोटर को लुभाने में लगी है, परंतु संकेत हैं कि मुफ्त वितरण करके वोट पाने की कांग्रेस की पाॉलिसी सफल नहीं है. अत: पानी, बिजली, फर्टिलाइजर आदि मुफ्त देने के स्थान पर क्रास-सब्सिडी की पॉलिसी अपनानी चाहिए.

आम आदमी पार्टी की अल्प समय की सरकार ने निर्णय लिया था कि कि हर मीटरधारक को 20 हजार लीटर पानी प्रति माह मुफ्त दिया जायेगा. इससे अधिक उपयोग करने पर संपूर्ण खपत का भुगतान करना होगा. यह पॉलिसी सही है. कम खपत करनेवाले कमजोर परिवार को राहत दी जानी चाहिए. लेकिन यहां विषय अधिक खपत करनेवालों से वसूली करके कम खपत करनेवालों को राहत पहुंचाना नहीं है.

यहां विषय कुल पानी की खपत बढ़ाने का है. कारण कि 20 हजार लीटर से अधिक खपत करनेवालों से बढ़ाकर मूल्य नहीं वसूला जा रहा है. अत: अमीरों द्वारा खपत पूर्ववत् रहेगी, जबकि आम आदमी द्वारा खपत बढ़ेगी. और यह योजना भी दूसरी पार्टियों की तरह वोट पाने के लिए सस्ते अन्न, मिड-डे मील अथवा इंदिरा आवास के मुफ्त वितरण जैसा ही है.

दिल्ली में कॉमर्शियल कनेक्शन के लिए पानी का अधिकतम रेट करीब 120 रुपये प्रति हजार लीटर है, जबकि चेन्नई में 800 रुपये. अत: कामर्शियल रेट में वृद्घि करके इस रकम को वसूला जा सकता है. मुंबई में उद्योगों द्वारा नगर निगम से सीवेज खरीद कर उसे साफ करके उपयोग में लाया जा रहा है, यह सस्ता पड़ता है. दिल्ली में भी कॉमर्शियल रेट बढ़ाने से सीवेज बेचने का अवसर पैदा होगा. सीवेज ट्रीटमेंट का खर्च भी बचेगा. मेरे अनुसार दिल्ली में बिकनेवाले डीजल और पेट्रोल पर दो रुपये अतिरिक्त टैक्स लगा दिया जाये, तो लगभग इतनी रकम एकत्रित की जा सकती है. पड़ोसी राज्यों की तुलना में सस्ता पेट्रोल बेचने का औचित्य नहीं है.

अत: धन के अभाव का बहाना बना कर कमजोर को राहत से वंचित नहीं करना चाहिए. गरीब की दृष्टि से सस्ते मूल्य की तुलना में पानी की उपलब्धि ज्यादा महत्व रखती है. वर्तमान में दिल्ली की लगभग 5 प्रतिशत जनता को टैंकरों से पानी सप्लाई की जाती है. टैंकर के न पहुंचने पर लोगों को सरकारी रेट 5 रुपये प्रति हजार लीटर के सामने हजार रुपये प्रति हजार लीटर में पानी खरीदना पड़ता है. करीब 5 फीसदी आबादी हैंडपंप पर निर्भर है. इन्हें प्रदूषित पानी से जीवन-यापन करना पड़ रहा है. 28 प्रतिशत आबादी सार्वजनिक स्टैंडपोस्ट पर निर्भर है. इनका समय पानी लाने में बरबाद होता है. इन सभी को घर में पाइप कनेक्शन देना चाहिए. दिल्ली में केवल 62 प्रतिशत लोगों को ही पाइप कनेक्शन उपलब्ध है. इनके लिए दाम घटाने के स्थान पर 38 प्रतिशत वंचित लोगों को पानी पहुंचाने को प्राथमिकता बनाना चाहिए.

वर्तमान में दिल्ली को टिहरी बांध से पानी मिल रहा है. इस बांध में गर्मी में अधिक वाष्पीकरण होने से केदारनाथ में विभीषिका आयी है, ऐसा मेरा मानना है. भागीरथी नदी की जैव विविधिता नष्ट हो रही है. आसपास बसे गांवों में भूस्खलन हो रहा है. इन पर्यावरणीय प्रभावों का आर्थिक मूल्य जोड़ लें, तो पानी की कुल लागत 5 रुपया प्रति हजार लीटर से बहुत अधिक है. अत: मुफ्त पानी उपलब्ध करा कर हम पानी की खपत को बढ़ायेंगे और तदानुसार उत्तराखंड के लोगों पर कहर बरपायेंगे. अंतत: हमें पानी की खपत कम करनी होगी और इसके मूल्य बढ़ाने होंगे. अत: गरीब को सीमित मात्र में पानी मुफ्त पहुंचाने चाहिए.

बिजली का मामला कुछ भिन्न है. यहां विषय वितरण कंपनियों द्वारा मुनाफाखोरी का है. बिजली उत्पादन कंपनियों के द्वारा पर्यावरण की क्षति का मूल्यांकन नहीं किया जाता है. यदि पर्यावरण की क्षति का मूल्यांकन किया जाये, तो बिजली का दाम लगभग 8 रुपये प्रति यूनिट पड़ेगा. परंतु उत्पादन कंपनियों के द्वारा इसे 3 रुपये प्रति यूनिट की दर से बेचा जा रहा है, चूंकि पर्यावरण की मार को आम आदमी पर सरका दिया जाता है. वितरण करनेवाली डिस्कॉम कंपनियों द्वारा 3 रुपये में खरीद कर बिजली को 5 रुपये में बेचा जा रहा है.

इस माजिर्न में मुनाफाखोरी अवश्य होगी. ऑडिट के द्वारा इस मुनाफाखोरी को बंद करने का प्रयास सही दिशा में है. पर उत्पादन क्षेत्रों में आम आदमी द्वारा झे ले जा रहे पर्यावरणीय दुष्परिणामों का क्या होगा? क्या दिल्ली वालों को सस्ती बिजली देने के लिए सोनभद्र के लोगों को थर्मल पावर की भट्टी में झोंक दिया जायेगा? अत: दो विपरीत पक्षों को समझना चाहिए. हमारा उद्देश्य मुनाफाखोरी समाप्त करने के साथ-साथ बिजली के दाम बढ़ा कर पर्यावरण की रक्षा होना चाहिए, न कि सस्ती बिजली उपलब्ध करा खपत एवं बरबादी को बढ़ाना. हां कम खपत करनेवाले गरीब के लिए दाम घटा कर ज्यादा खपत करनेवालों के लिए दाम बढ़ाये जा सकते हैं.

चुनाव के समय हर पार्टी वोटर को लुभाने में लगी है. पर संकेत हैं कि मुफ्त वितरण करके वोट पाने की कांग्रेस की पाॉलिसी सफल नहीं है. अत: पानी, बिजली, फर्टिलाइजर आदि मुफ्त देने के स्थान पर क्रास-सब्सिडी की पॉलिसी अपनानी चाहिए. क्रास सब्सिडी के कारण बची रकम को बुनियादी संरचना में लगा कर वोट हासिल करना चाहिए.

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