उत्तर प्रदेश में राहुल की चुनौतियां!

।। कृष्ण प्रताप सिंह।। (वरिष्ठ पत्रकार) कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनने का सपना सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी के दमदार प्रदर्शन के बिना पूरा होना मुश्किल ही लगता है. लेकिन 2012 में हुए प्रदेश विधानसभा के चुनाव में पार्टी की करारी हार की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए रीता […]
।। कृष्ण प्रताप सिंह।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनने का सपना सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी के दमदार प्रदर्शन के बिना पूरा होना मुश्किल ही लगता है. लेकिन 2012 में हुए प्रदेश विधानसभा के चुनाव में पार्टी की करारी हार की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए रीता बहुगुणा ने अपने पद से इस्तीफा दिया था, तो एक कड़वी सच्चाई बयान की थी, ‘हमारे नेता कम बोलते तो हम बेहतर करते.’ उनका इशारा साफ था कि सलमान खुर्शीद व बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेताओं का बड़बोलापन पार्टी की संभावनाओं पर भारी पड़ा. अब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं, तो इन नेताओं का बड़बोलापन फिर सिर चढ़ कर बोल रहा है. नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह कर विवाद पैदा करनेवाले खुर्शीद का मुंह राहुल के नाराजगी जताने के बावजूद बंद नहीं है और बेनी प्रसाद वर्मा के विवाद खड़े करनेवाले बयानों की संख्या बढ़ती जा रही है. विवादों के चलते पार्टी अंतर्कलह और भितरघात से भी जूझ रही है. अंबेडकर नगर में प्रत्याशी-चयन के लिए मतदान में ही इतना वितंडा हुआ कि दो नेताओं को पार्टी से निष्कासित करना पड़ा.
2009 में मुलायम और कल्याण की गलबहियां से नाराज मुसलमान मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा बाबरी विध्वंस के बाद पहली बार कांग्रेस की ओर लौटा था, जिसके फलस्वरूप उसे अप्रत्याशित रूप से 21 सीटें मिली थीं. लेकिन पार्टी ने उनके समर्थन के प्रति कोई उत्साह नहीं जताया और न ही उसे दीर्घकालिक बनाने के जतन किये. भले ही उनकी नाराजगी दूर करने के लिए उसने बाबरी विध्वंस न रोक पाने के लिए माफी तक मांगी थी. उसके बेहद ठंडे रेस्पांस के कारण गत विधानसभा चुनाव में मुलायम के कल्याण को साथ लेने के लिए खेद जताते और उनसे पिंड छुड़ाते ही ये मतदाता फिर सपा के साथ हो गये. अब सपा से उनकी नाराजगी और नरेंद्र मोदी को रोकने के नाम पर भी उनको फिर से अपने पाले में लाना दुरूह हो रहा है.
राहुल गांधी की छवि उड़न-छू ढंग से काम करनेवाले नेता की बन गयी है. बीते विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने कहा था कि इसके बावजूद उनका मिशन उत्तर प्रदेश जारी रहेगा, जब तक कि वे प्रदेश की हालत बदलने में सफल नहीं हो जाते. लेकिन उसके बाद के दो वर्षो में उन्होंने और तो और अपने दलित एजेंडे को भी आगे नहीं बढ़ाया. नोएडा के भट्ठा पारसौल में भू-अधिग्रहण से पीड़ित किसानों के लिए धरने पर बैठने के बाद उन्हें किसी और किसान मुद्दे की याद नहीं आयी. अब वे इन सबकी ओर से ध्यान हटा कर उड़न-छू ढंग से रिक्शेवालों और महिला मतदाताओं के छोटे-छोटे समूहों से बात करके उनको पटा रहे हैं.
गत विधानसभा चुनाव में ‘एंग्री यंग मैन’ शैली का उनका चुनाव-प्रचार किसी काम नहीं आया था. लेकिन इस बार भी पार्टी के विज्ञापनों में उनके युवा जोश पर ही जोर है. प्रश्न है कि मनमोहन सरकार के सारे किये-धरे का बोझ अपने सिर पर लादे वे मतदाताओं को कैसे संबोधित करेंगे? उनकी नीतियां बदलने की बात करेंगे, तो फिर प्रश्न उठेगा कि अब तक क्यों नहीं बदलीं. यही नहीं, राहुल प्रदेश की अखिलेश सरकार की असफलताओं को भी मुद्दा नहीं बना पाये हैं. उनके पास भाजपा की इस पुरानी आलोचना का कोई उत्तर नहीं है कि केंद्र में एक दूजे से समर्थन का लेनदेन करनेवाली सपा, बसपा और कांग्रेस की प्रदेश में एक दूजे की आलोचना जनता को भरमाने के लिए है. नरेंद्र मोदी ने शायद यही दर्शाने के लिए लखनऊ में कहा कि भाजपा की सुनामी में इन ‘सबका’ यानी सपा, बसपा और कांग्रेस का विनाश हो जायेगा.
यूपी में कांग्रेस सबसे अभागी पार्टी है. उसका कोई वोट बैंक बचा ही नहीं है. गांधी-नेहरू परिवार के सम्मोहन का दौर पीछे छूट गया है या यों कहें कि अमेठी-रायबरेली तक सीमित रह गया है. 2009 में 21 सीटों पर जीत के बाद उम्मीद थी कि वह इस शून्य को भरने की दिशा में सचेष्ट होगी, लेकिन पिछले पांच वर्षो में उसने कई ऐसे नये शून्य पैदा कर दिये, राहुल के लिए जिन्हें जल्दी भरना संभव नहीं होगा.
प्रदेश में ओपीनियन पोल और मीडिया दोनों का रुख कांग्रेस के खिलाफ हैं. एक नेता के तौर पर राहुल के पास कार्यकर्ताओं को उत्साहित करनेवाला कोई मैसेज नहीं है. कार्यकर्ता उनसे जिस चमत्कार की उम्मीद करते हैं, उसे वे कई चुनावों में भरपूर मेहनत के बावजूद नहीं कर पाये हैं. फिलहाल उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी न घोषित करने का भी नकारात्मक असर ही हो रहा है. चुनाव सिर पर हैं, तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री, जो खुद मास लीडर नहीं हैं, विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों मे सम्मेलन करके बूथ मैनेजमेंट ठीक करने का दावा कह रहे हैं. लेकिन यह पूछने पर कि यह काम पहले क्यों नहीं किया गया, वे चुप रह जाते हैं. उन्हें लगता है कि हाल में किये गये लोक-लुभावन फैसले ही कांग्रेस को चुनाव जिता सकते हैं.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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