ढीले रवैये से नहीं रुकेगा भ्रष्टाचार

झारखंड की राजधानी रांची में सोमवार को निगरानी विभाग ने एक राजस्व कर्मचारी को घूस लेते रंगे हाथ पकड़ा. वह पांच हजार रुपये घूस ले रहा था. शुरुआती जांच में पता चला है कि उसने 40 लाख रुपये की संपत्ति इकट्ठा कर रखी थी. निगरानी का यह प्रयास सराहनीय है, पर नाकाफी है. छोटी मछलियां […]
झारखंड की राजधानी रांची में सोमवार को निगरानी विभाग ने एक राजस्व कर्मचारी को घूस लेते रंगे हाथ पकड़ा. वह पांच हजार रुपये घूस ले रहा था. शुरुआती जांच में पता चला है कि उसने 40 लाख रुपये की संपत्ति इकट्ठा कर रखी थी. निगरानी का यह प्रयास सराहनीय है, पर नाकाफी है. छोटी मछलियां तो कभी-कभार गिरफ्त में आ जाती हैं, पर भ्रष्टाचार के मगरमच्छ उसकी पकड़ से दूर हैं.
भू-राजस्व विभाग भ्रष्टाचार का अड्डा है. यहां कोई काम बिना चढ़ावे के नहीं होता. निचले कर्मचारी से लेकर आला अफसर तक इस रिश्वतखोरी के हिस्सेदार हैं. पर बड़े अफसर शायद ही कभी पकड़े जाते हैं. बिहार ने भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए एक अच्छी शुरुआत की, बेईमानी से जमा संपत्ति को जब्त करने का कानून बना कर. इस कानून के तहत कुछ बड़े अफसरों की संपत्ति जब्त भी की गयी और उसमें स्कूल खोल दिया गया. यह सही है कि बिहार में यह कानून बहुत सख्ती से लागू नहीं हो पा रहा है, पर कम से कम शुरुआत तो हुई.
वहीं झारखंड में इस कानून की मांग हो रही है, पर सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी. अभी झारखंड विधानसभा का सत्र चल रहा है. विपक्ष यह कानून लाने की मांग कर रहा है, पर सरकार टालने में लगी है. जब तक सरकार की ओर इच्छाशक्ति नहीं दिखायी जायेगी, तब तक वो एजेंसियां भी सुस्त रहेंगी जिन पर भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है. ये एजेंसियां काम करेंगी, पर उन्हें यकीन तो हो कि सरकार सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई चाहती है. झारखंड में लोकायुक्त है, लेकिन वह भी नख-दंतविहीन है. उसके पास कोई संसाधन ही नहीं है.
छापेमारी के लिए अपना बल नहीं है. जांच करने के लिए टीम नहीं है. वह पूरी तरह निर्भर है पुलिस और निगरानी विभाग पर, जो पहले से काम के बोझ से दबे हैं. मध्य प्रदेश और कर्नाटक में लोकायुक्त को साधन-संपन्न बनाया गया है, तो इसके सकारात्मक नतीजे भी सामने आये हैं. मध्य प्रदेश में कई भ्रष्टाचारी अफसर व कर्मचारी जेल भेजे गये हैं. दसियों करोड़ की संपत्ति बरामद की जा चुकी है. इधर झारखंड लोकायुक्त के पास शिकायतें आती हैं, पर संसाधन के अभाव में वे केवल फाइलों की शोभा बढ़ाती हैं. क्या ऐसे रवैये से भ्रष्टाचार थमेगा?
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