तो आइए, एक कप राजनीति हो जाये!

।। अखिलेश्वर पांडेय।। (प्रभात खबर, जमशेदपुर) चाय पीना-पिलाना कई दशकों से हमारी भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुका है. दोस्ती के नाम पर चाय, रिश्ता निभाने के लिए चाय, रिश्ता बनाने के लिए चाय, रिश्ता बचाने के लिए चाय. और तो और, कभी-कभी तो बेगानापन जताने के लिए भी चाय की जरूरत पड़ती है. […]
।। अखिलेश्वर पांडेय।।
(प्रभात खबर, जमशेदपुर)
चाय पीना-पिलाना कई दशकों से हमारी भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुका है. दोस्ती के नाम पर चाय, रिश्ता निभाने के लिए चाय, रिश्ता बनाने के लिए चाय, रिश्ता बचाने के लिए चाय. और तो और, कभी-कभी तो बेगानापन जताने के लिए भी चाय की जरूरत पड़ती है. चाय दूरियां मिटाती है, चाय खूबियां बढ़ाती है. अमीर से लेकर गरीब तक, चाय अब सबकी जरूरत बन गयी है.
फर्क सिर्फ इतना है कि अमीर शौक से चाय पीता है और गरीब भूख मिटाने के लिए. भूख लगी हो और जेब खाली हो, तो थाली की जगह एक कप चाय से ही गरीब अपना काम चला लेता है. कभी बात की शुरुआत चाय से, तो कभी काम की शुरुआत चाय से. चाय गांव की चौपाल से लेकर शहर भोपाल तक, अपने असली रंग और स्वाद के साथ मौजूद होती है. चाय के शौकीन कहते हैं कि इसे पीने से उनको ताजगी महसूस होती है. चाय के कई ‘फायदे’ हैं या हो सकते हैं, इसे आप भी जानते होंगे. पर इन दिनों चाय के ‘कायदे’ को लेकर पूरे देश में चर्चा जोरों पर है. यह ‘चाय राजनीति’ है.
चाय के बहाने ‘चाह’. यह चाह है सत्ता पाने की. राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक से बढ़ कर एक ‘बोल-वचन’ सुनने को मिल रहे हैं. कोई खुद को चायवाला बता रहा है, कोई दूधवाला, तो कोई खुद को पुड़िया बांधने में माहिर बताता है. लोग परेशान हैं कि इन महानुभावों का असली परिचय अगर वह है जो ये खुद बता रहे हैं, तो इनमें मेरा नेता कौन है? यानी, भारी कन्फ्यूजन. एक वक्त था, जब राजनीति में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ थी, पर आज ऐसा लगता है जैसे नीचे गिरने की होड़ मची है. जो जितना गिर सकता है, वह उतना ऊपर उठेगा. चलो अच्छा है, इसी बहाने समाज के उस तबके को पहचान तो मिल रही है जो वर्षो से उपेक्षित है. रिक्शेवालों के साथ सड़क पर बैठकी, ऑटोवालों को अपना हमदर्द बताना, चायवालों को अपनी बिरादरी का होने का एहसास दिलाना- यह सब चुनावी मौसम की उस ठंडी फुहार जैसी है जो अच्छी तो लगती है, पर स्थायी सुख नहीं देती.
बात को खोल कर कहूं तो यह महज चुनावी चोंचलेबाजी है, जो चुनाव खत्म होते ही चूं-चूं के मुरब्बे की तरह बेस्वाद साबित होगी. राजनीतिक हितों को साधने की कला में माहिर ये महारथी अपने ‘बोल-वचन’ से इस देश की भोली-भाली जनता को वर्षो से यूं ही बरगलाते रहे हैं. आज जरूरत है इनकी चालाकियां समझने की. ‘एक कप चाय’ से ‘एक वोट’ की कीमत नहीं आंकी जा सकती. सोचना और तय करना आपको है कि आप चाय किसकी पीयें और किसके साथ पीयें. क्योंकि हालात सही नहीं हों, तो चाय बेस्वाद और कड़वी होने में ज्यादा देर नहीं लगती. हड़बड़ी में पीने से होंठ भी जलने का खतरा बना रहता है. यह एक कप राजनीति है जनाब..जरा ठहरिये, कहीं हड़बड़ में गड़बड़ न हो जाये!
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