मुक्तिबोध और हमारा समय

Updated at : 03 Mar 2017 6:42 AM (IST)
विज्ञापन
मुक्तिबोध और हमारा समय

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया कवि मुक्तिबोध पर बात करते हुए हम शुरू करते हैं गुरमेहर कौर के उस प्रसंग से जिसमें उन्होंने कहा था- ‘उसके पिता को पाकिस्तानी फौज ने नहीं, बल्कि युद्ध ने मारा है.’ उसके इस सोशल मीडिया के पोस्ट ने हंगामा खड़ा कर दिया है. देशभक्ति […]

विज्ञापन
डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
कवि मुक्तिबोध पर बात करते हुए हम शुरू करते हैं गुरमेहर कौर के उस प्रसंग से जिसमें उन्होंने कहा था- ‘उसके पिता को पाकिस्तानी फौज ने नहीं, बल्कि युद्ध ने मारा है.’ उसके इस सोशल मीडिया के पोस्ट ने हंगामा खड़ा कर दिया है. देशभक्ति के अर्थ को पाकिस्तान विरोध तक सीमित करनेवाले कथित देशभक्तों ने उन्हें बलात्कार की धमकी तक दे डाली. कुछ सेलिब्रिटीज ने जिस संवेदनहीनता से उसकी खिल्ली उड़ायी है, यह उनकी बौद्धिक विकलांगता को ही प्रदर्शित करता है. बुद्ध और गांधी के देश में संवेदनहीनता और क्रूरता के इस हद की परिकल्पना कभी नहीं की गयी थी.
कथित राष्ट्रवादी राजनीति करनेवाले जिस तरह से ‘युद्ध विरोधी’ होने को ‘पाकिस्तान समर्थन’ के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, यह भयावह है. ‘पाकिस्तान विरोध’ में ‘युद्ध का समर्थक’ हो जाना जनता को विकलांगता की अंधेरी गली में धकेल देना है. युद्ध कभी भी जनता के हित में नहीं रहा है.
दो महायुद्धों और अरब के देशों में हो रहे युद्ध के परिणामों को देखने के बाद तो कभी युद्ध का समर्थक नहीं हुआ जा सकता है. दरअसल, सत्ता में आने और सत्ता को बचाने के लिए उग्र राष्ट्रवाद सबसे सहज माध्यम होता है, लेकिन उसका परिणाम अंततः युद्ध ही होता है. इटली में मुसोलिनी और जर्मनी में हिटलर ने ऐसा ही किया था, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया युद्ध के दलदल में फंस गयी थी. गुरमेहर का ‘युद्ध विरोध’ कथित राष्ट्रवादी राजनीति करनेवालों के लिए बाधक है, क्योंकि यह युद्ध और राष्ट्रवाद दोनों को अलग करता है. कवि मुक्तिबोध के शब्दों में क्या यह कहा जा सकता है कि गुरमेहर कौर की युवा पीढ़ी ने रात के ‘अंधेरे में’ जुलूस में शामिल ‘डोमाजी उस्ताद’ को देख लिया है, सत्ताधारियों के असली चेहरे को देख लिया है, जिसके चलते भीड़ उनके पीछे पड़ गयी है?
यह गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी वर्ष है. मुक्तिबोध आधुनिक हिंदी कविता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवि हैं, जिनका काव्य-चिंतन समय के साथ और भी प्रासंगिक होता जा रहा है. उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति हमारे समय के संवेदनशील पहलुओं से आज भी गंभीरतापूर्वक संवाद करती है. अभिव्यक्ति के खतरों को उठानेवाली मुक्तिबोध की बात आज के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों से सीधा संवाद करती है.
मुक्तिबोध की कविताओं का स्वर राजनीतिक है. लेकिन, वे उन अन्य राजनीतिक कवियों से अलग हैं, जो या तो सिर्फ राजनीतिक एजेंडे पर कविताएं लिखते हैं या सिर्फ वस्तुगत बातें करते हैं. मुक्तिबोध की कविता में स्थूलता नहीं है.
वे एक साथ वस्तुगत और आत्मगत दोनों हैं. वे कहते हैं कि अंतर और बाह्य से ही चेतना का निर्माण होता है. ‘अंतर’ व्यक्ति के जीवन का ‘आत्म पक्ष’ है और बाह्य उसका ‘वस्तुजगत’ है. उन्होंने जीवन की व्याख्या ‘बाह्य’ और ‘आत्म’ या ‘अंतर’ के योग से की है और इसीलिए उनके यहां सबसे ज्यादा आत्मसंघर्ष है. बाहर की दुनिया को देख कर सबसे ज्यादा उनके अंदर की दुनिया में बेचैनी है. वे बार-बार अपने व्यक्ति मन के तहों में घुस कर जीवन के यथार्थ को विश्लेषित कर उसके सत्य तक पहुंचना चाहते हैं. इसीलिए उनकी कविताओं का स्वर अन्य कवियों से अलग है. उनकी वैचारिकी मार्क्सवादी है. लेकिन, मार्क्सवाद में ‘आत्मजगत’ के बजाय ‘वस्तुजगत’ पर ज्यादा जोर दिया जाता है, इसलिए उन्हें स्वीकार करने में शुरू में मार्क्सवादी आलोचकों को भी परेशानी रही है.
मुक्तिबोध ने आजादी के बाद निर्मित हो रहे पूंजीवादी समाज और राजनीतिक विसंगतियों की तीखी आलोचना की है. उनकी सबसे प्रसिद्ध काव्य पंक्ति है- ‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/ उठाने ही होंगे/तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब.’ यह कविता की दुनिया में सबसे ज्यादा उद्धृत की जानेवाली पंक्ति है. अनायास नहीं है कि आज का भारतीय समाज सबसे ज्यादा इन्हीं काव्य पंक्तियों से होकर गुजर रहा है. आज लेखक समुदाय अपनी कलम की वजह से हमलों का शिकार हो रहा है. दलित-वंचित समुदाय अपनी आवाज की वजह से मारे जा रहे हैं.
अपने हक की आवाज उठा रही स्त्रियों की जुबान काट दी जा रही है. देश की आंतरिक समस्याओं पर छात्रों को चर्चा करने से रोका जा रहा है. विश्वविद्यालयों को ज्ञान और विचार-विमर्श के बजाय खास राजनीतिक विचारधारा का अनुगामी होने के लिए बाध्य किया जा रहा है. सत्ता पक्ष किसी भी तरह की आलोचना को देश-विरोधी भावना कह कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन कर रही है. यह पंक्ति ‘अंधेरे में’ नामक जिस कविता में लिखी गयी है, वह कविता पूंजीवादी समाज के ऐसे ही विद्रूप चेहरे को अभिव्यक्त करती है, जो फासिज्म के जरिये अपनी सत्ता को बनाये रखना चाहती है.
मुक्तिबोध के यहां स्वयं का और सत्ता का सबसे तीखा क्रिटिक है. वे जन-संघर्ष के मोर्चों पर मारे जा रहे लोगों को देख कर आत्म-भर्त्सना में कहते हैं- ‘अंत:करण का आयतन संक्षिप्त है/आत्मीयता के योग्य सचमुच मैं नहीं.’ मध्यवर्ग की अवसरवादिता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहते हैं- ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन/ ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/ अब तक क्या किया?/जीवन क्या जिया!/ बहुत-बहुत ज्यादा लिया/ दिया बहुत-बहुत कम/ मर गया देश/ अरे, जीवित रह गये तुम!’ सत्ता वर्ग के चरित्र की सूक्ष्म पहचान है उनकी कविताओं में- ‘नभचुंबी ज्वाला के प्रकाश से/ भारतीय-संस्कृति-विकास किया जा रहा/ शोषण के भयानक जबड़ों ने फूंक मार/ झोपड़ियां गिरा दी, व मकान ढहा दिये… कहीं गोली चल गयी/ कहीं आग लग गयी.’
आज हमारे जीवन से आलोचना और आत्मालोचना का पक्ष खत्म हो रहा है और इसलिए व्यक्ति, समाज और राजनीति स्वैराचार हुए जा रहे हैं. आलोचना के लिए साहस की जरूरत होती है. मध्यवर्गीय लालसाओं ने हमारे अंदर के साहस को दफना दिया है और हम बिना किसी तर्क के सत्ताओं के अनुचर बन गये हैं.
मुक्तिबोध के काव्य चिंतन से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि आलोचना और आत्मालोचना के अभाव में ही समाज में कट्टरता पैदा होती है. इसके बिना ही कोई भी प्रतिरोधी शक्ति सत्ता पाकर अपने चरित्र के विपरीत दमनकारी हो जाती है. कथित राष्ट्रवाद के नाम पर आज देश के अंदर बढ़ता अतिवाद इसी का दुष्परिणाम है.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola