बुद्धिजीवियों की जिम्मेवारी

Updated at : 27 Feb 2017 6:13 AM (IST)
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बुद्धिजीवियों की जिम्मेवारी

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार इस शीर्षक (दि रिस्पॉन्सबिलिटी ऑफ इंटेलेक्चुअल्स) से पचास वर्ष पहले (23 फरवरी, 1967) को नोम चोम्स्की ने ‘दि न्यूयॉर्क रिव्यू ऑफ बुक्स’ में तीस पृष्ठों का जो एक अालेख लिखा था, आज उस पर संयुक्त राज्य अमेरिका में पुन: ध्यान दिया जा रहा है. 1947 में जब नोम चोम्स्की स्नातक के छात्र […]

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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
इस शीर्षक (दि रिस्पॉन्सबिलिटी ऑफ इंटेलेक्चुअल्स) से पचास वर्ष पहले (23 फरवरी, 1967) को नोम चोम्स्की ने ‘दि न्यूयॉर्क रिव्यू ऑफ बुक्स’ में तीस पृष्ठों का जो एक अालेख लिखा था, आज उस पर संयुक्त राज्य अमेरिका में पुन: ध्यान दिया जा रहा है. 1947 में जब नोम चोम्स्की स्नातक के छात्र थे, उन्होंने अमेरिकी लेखक, संपादक, फिल्म आलोचक डवाइट मैकडोनाल्ड (24 मार्च, 1906-19 दिसंबर, 1982) की ‘पॉलिटिक्स’ में प्रकाशित बौद्धिकों की जिम्मेवारी पर प्रकाशित लेखों की एक सीरीज पढ़ी थी. यह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समय था. चोम्स्की ने 20 वर्ष बाद (1967) में वह निबंध पढ़ कर अपना यह सुचिंतित-सुचर्चित लेख लेखा था. मैकडोनाल्ड ने यह सवाल किया था कि जर्मन और जापानी जनता उस अत्याचार के लिए कहां तक जिम्मेवार थी, जो उनकी सरकारों ने किये थे. ब्रिटेन और अमेरिका ने जो बमबारी की थी, उसके लिए ब्रिटेन और अमेरिका की जनता कितनी दोषी थी?
कुछ समय से भारत में ‘बौद्धिक आतंकवाद’ (इंटेलेक्चुअल टेररिज्म) की चरचा चलायी जा रही है. एक हौवा खड़ा किया जा रहा है. आगामी 4 मार्च, 2017 को एक सूचना के अनुसार, छत्तीसगढ़ के दुर्ग में ‘जीरो टॉलरेंस अगेंस्ट इंटेलेक्चुअल टेररिज्म’ पर पुलिस अधिकारी विचार व्यक्त करेंगे. कहां बौद्धिकों की जिम्मेवारी की चिंता और कहां ‘पोस्ट ट्रूथ’ समय में ‘बौद्धिक आतंकवाद’ का एक साजिश के तहत किया जा रहा प्रयोग. प्रत्येक देश और समाज में वहां के बुद्धिजीवियों की एक अहम भूमिका होती है. सामान्य लोगों की जिम्मेवारी से कहीं बड़ी जिम्मेवारी बौद्धिकों की है.
अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद चोम्स्की का निबंध पचास वर्ष पहले वियनाम युद्ध के बाद हम सब का ध्यान आकृष्ट करता है. सामान्य रूप से प्राय: प्रत्येक शिक्षित सुशिक्षित व्यक्ति जिसमें प्रोफेसर, कवि, लेखक, कलाकार, समीक्षक, पत्रकार, संपादक, वकील, न्यायाधीश आदि या फिर हर वह व्यक्ति आता है, जो सबके लिए बेहतर सोचते हैं. इन सबको बद्धिजीवी कहने का भारत में एक चलन है, जो झूठ, अन्याय, उत्पीड़न, भेदभाव, जन विरोधी नीतियों, जाति, धर्म, संप्रदाय आदि से जुड़ा है, वह भी अपने को बौद्धिक समझता है, जो गलत है. हमारे यहां छद्म, सरकारी, बंधुआ बुद्धजीवियों की संख्या कम नहीं है. विश्व के विविध हिस्सों में जो भी जन-विरोधी कार्य किये जाते हैं, एक वास्तविक बुद्धिजीवी उसका डट कर विरोध करता है. चुप रहनेवाला कायर होता है और बुद्धिजीवी साहसी और निर्भिक होता है. उन्हें जनता के द्वारा प्राप्त अद्वितीय विशेषाधिकार की आनंद प्राप्ति होती है.
चोम्स्की का इस पर विशेष बल है कि बुद्धिजीवियों को सच के साथ और झूठ-अन्याय के विरुद्ध सदैव खड़ा होना चाहिए. सरकार के कार्यों, नीतियों, क्रिया-कलापों पर उसकी न केवल दृष्टि रहनी चाहिए, अपितु उसे झूठ का भंडाफोड़ करना चाहिए. अपने एक इंटरव्यू में चोम्स्की ने ट्रंप के चुनाव को सरकार, कार्यपालिका, कांग्रेस, सुप्रीम कोर्ट सबको रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण में आने की बात कही थी और उसे विश्व इतिहास में सर्वाधिक खतरनाक संगठन माना था. उनके विचार मुख्यत: संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े हैं, पर वे संपूर्ण विश्व के लिए कहीं अधिक प्रासंगिक हैं.
विगत ढाई वर्ष से जिस प्रकार एक विचारधारा और राजनीतिक दल के छात्र संगठन अनेक विश्वविद्यालयों में हमले कर रहे हैं, वह कहीं अधिक चिंताजनक है. हैदराबाद विश्वविद्यालय, जेएनयू, जादवपुर, कुरुक्षेत्र, दिल्ली विश्वविद्यालय इसके बड़े उदाहरण हैं. अभी 20 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ पर आधारित दो दिवसीय सेमिनार में वक्ताओं को बोलने से रोकना और उस स्थान और अवसर पर पुलिस का मूकदर्शक बने रहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करनेवाली शक्तियों का सत्ता से प्रत्यक्ष संबंध प्रकट करता है. विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हमला, पत्रकारों के कैमरे तोड़ना आलोचनात्मक संस्कृति पर प्रहार है.
भारत में आज बुद्धिजीवियों का यह दायित्व है कि वे अपनी बौद्धिक ऊर्जा सक्रियता के साथ बौद्धिक सन्नाटे को भंग करें. उन्हें न केवल नाेम चोम्स्की के इस निबंध से, अपितु ग्राम्शी द्वारा बुद्धिजीवियों की भूमिका-सक्रियता पर लिखे विचारों से कहीं अधिक प्रेरणा ग्रहण करने की आवश्यकता है. मुक्तिबोध ने ‘अंधेरे में’ कविता में डोमा उस्ताद के साथ जुलूस में शामिल बौद्धिकों को देखा था. इक्कीसवीं सदी का भारत अपने बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा करता है कि वे अपनी जिम्मेवारी समझें और साहसी, सक्रिय और निर्भिक बनें.
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