न्यायिक सुधार पर जोर

Updated at : 24 Feb 2017 6:40 AM (IST)
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न्यायिक सुधार पर जोर

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने न्यायिक सुधारों की दिशा में काम करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए कहा है कि हर व्यवस्था में समय के साथ कुछ समस्याएं आ जाती हैं, जिन्हें दूर करते रहने का निरंतर प्रयास किया जाना चाहिए. करीब तीन करोड़ लंबित मामलों के बोझ से दबे हुए हमारे न्यायालय जजों और […]

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने न्यायिक सुधारों की दिशा में काम करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए कहा है कि हर व्यवस्था में समय के साथ कुछ समस्याएं आ जाती हैं, जिन्हें दूर करते रहने का निरंतर प्रयास किया जाना चाहिए. करीब तीन करोड़ लंबित मामलों के बोझ से दबे हुए हमारे न्यायालय जजों और कक्षों की कमी से जूझ रहे हैं. कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें भी मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को बाधित करती हैं. उच्च न्यायालयों में समुचित संख्यों में जजों की नियुक्ति में देरी के मुद्दे पर बीते साल केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय की बीच में तकरार के भी सकारात्मक परिणाम नहीं निकल सके हैं.
भारत में 73 हजार से अधिक आबादी पर औसतन एक जज है, जो कि अमेरिका की तुलना में सात गुना अधिक है. वर्ष 1987 में ही विधि आयोग ने जजों की संख्या पांच गुना बढ़ाने की सिफारिश की थी. पर, सुधार की बहस को सिर्फ नियुक्ति तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए और मामलों के शीघ्र निपटारे पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. इसके लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें और पीठ स्थापित किये जा सकते हैं. अदालतों का आधुनिकीकरण करने और कार्य-दिवस बढ़ाने के साथ मुकदमे की सुनवाई लटकाने की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की जरूरत है. ‘तारीख-पे-तारीख’ के रवैये से आम जनता को न्याय मिलने में देरी तो होती ही है, धन और समय की बरबादी भी होती है. एक हजार से अधिक मौजूदा कानून ब्रिटिश शासन से ही बने हुए हैं. उन्हें हटाने या संशोधित करने के लिए प्रयास तेज किये जाने चाहिए. पिछले दिनों फर्जी वकीलों की बड़ी संख्या का मामला भी सामने आया है.
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय प्रक्रिया हर किसी के लिए सुलभ होनी चाहिए, अन्यथा समतामूलक समाज बनाने तथा आर्थिक विकास करने की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो सकती हैं. वर्ष 2017-18 के बजट में न्यायिक प्रशासन के लिए 1,744.13 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं, जो 21.47 लाख करोड़ के पूरे बजट का एक फीसदी भी नहीं है. इसमें सुधारों और न्याय देने के लिए बने राष्ट्रीय आयोग के लिए 432.50 करोड़ का प्रावधान है. इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने तथा निपटारे की प्रक्रिया तेज करने के लिए धन और संसाधन की ठोस व्यवस्था की जानी चाहिए. उम्मीद है कि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति की सलाह पर ध्यान देते हुए सुधारों की ओर तेज गति से बढ़ेंगे.
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