बड़ों को चाहिए आपका साथ व सम्मान

Published at :03 Mar 2014 4:58 AM (IST)
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बड़ों को चाहिए आपका साथ व सम्मान

परिवार की शान कहे जाने वाले हमारे बड़े-बुजुर्ग आज परिवार में अपने ही अस्तित्व को तलाशते नजर आ रहे हैं. तिनका-तिनका जोड़ कर अपने बच्चों के लिए आशियाना बनानेवाले, पुरानी पीढ़ी के ये लोग अब खुद आशियाने की तलाश में दरबदर भटक रहे हैं. ऐसे में इनका ठिकाना बन रहे हैं वृद्धाश्रम, जहां इन्हें रहने […]

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परिवार की शान कहे जाने वाले हमारे बड़े-बुजुर्ग आज परिवार में अपने ही अस्तित्व को तलाशते नजर आ रहे हैं. तिनका-तिनका जोड़ कर अपने बच्चों के लिए आशियाना बनानेवाले, पुरानी पीढ़ी के ये लोग अब खुद आशियाने की तलाश में दरबदर भटक रहे हैं. ऐसे में इनका ठिकाना बन रहे हैं वृद्धाश्रम, जहां इन्हें रहने को छत और खाने को भरपेट भोजन मिल रहा है.

बस यहां कमी है तो उस औलाद की, जिन्हें इन मां-बाप ने अपना खून-पसीना एक करके पढ़ाया-लिखाया था लेकिन आज उसी ने इन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया है. क्या यही संस्कार देते हैं मां-बाप अपने बच्चों को, जिसके कारण बुढ़ापे में उन्हें भरपेट भोजन के लिए भी अपने बच्चों की सेवा-चाकरी करनी पड़ती है और घर के मालिक को अपने ही घर में नौकर या तिरस्कृत व्यक्ति की तरह जीवन गुजारना पड़ता है? इसमें दोष हमारा नहीं है, बल्कि उस संस्कृति का है जिसके अंधानुकरण की होड़ में हम लगे हुए हैं.

बगैर कुछ सोचे-समङो हम भी दूसरों की देखादेखी एकल परिवार प्रणाली अपना कर अपनों से ही किनारा कर रहे हैं. ऐसा करके हम अपने हाथों अपने बच्चों को उस प्यार, संस्कार, आशीर्वाद व स्पर्श से वंचित कर रहे हैं, जो उनकी जिंदगी को संवार सकता है. किराये पर भले ही प्यार मिल सकता है, लेकिन संस्कार, आशीर्वाद और दुआएं नहीं. ये सब तो हमें मां-बाप से ही मिलते हैं. दरअसल, यह सब अनुभव और नयी सोच की तकरार का मुद्दा है. अपने प्यार से रिश्तों को सींचने वाले इन बुजुर्गो को भी बच्चों से प्यार व सम्मान चाहिए. अपने बच्चों की खातिर अपना जीवन दांव पर लगा चुके इन बुजुर्गो को अब अपनों के प्यार की जरूरत है. अगर इन्हें परिवार में स्थान और सम्मान मिले तो शायद वृद्धाश्रम की जरूरत ही न पड़े.

मनीष वैद्य, रांची

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