मीडिया पर नेताओं का विष-वमन

(अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार) पत्रकार वर्ग एवं पत्रकारिता संस्थानों की भूमिका की समय-समय पर आलोचनाएं होती हैं और इनमें कई बार आक्रोश और खीझ भी दिखता है. हालांकि इस मामले में स्वयं पत्रकारों के अंदर से ही अपनी विधा को लेकर जितनी आक्रामक आलोचना होती है, उतने दूसरी किसी विधा के अंदर नहीं होता. इसके […]
(अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार)
पत्रकार वर्ग एवं पत्रकारिता संस्थानों की भूमिका की समय-समय पर आलोचनाएं होती हैं और इनमें कई बार आक्रोश और खीझ भी दिखता है. हालांकि इस मामले में स्वयं पत्रकारों के अंदर से ही अपनी विधा को लेकर जितनी आक्रामक आलोचना होती है, उतने दूसरी किसी विधा के अंदर नहीं होता. इसके पीछे मूल भाव पत्रकारिता को मूल्यों, मुद्दों और जनसरोकारों से आबद्घ रखने की है. लेकिन हाल के दिनों में राजनीतिक दलों की ओर से जिस तरह गुस्सा उतारा गया है और वह क्रम लगातार जारी है. आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह अपने एक पूरे भाषण का तीन चौथाई अंश मीडिया पर हमले पर केंद्रित कर दिया, उसके पीछे एकमात्र उद्देश्य अपनी आलोचना को पूंजीपतियों की दलाली साबित करना था. केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो यह चेतावनी ही दे दी कि वे मीडिया को कुचल डालने की कार्रवाई करेंगे. आप इन दोनों के पूरे भाषण को सुनेंगे तो साफ हो जायेगा कि दोनों की मंशा एक ही थी कि मीडिया उनके, उनकी पार्टी, सरकार या नीतियों या नेताओं की तीखी आलोचना-विरोध न करे.
केजरीवाल और शिंदे की राजनीतिक सोच एवं व्यवहार में अंतर है, पर इस मामले में दोनों लगभग एक धरातल पर हैं. हां, अरविंद इस तरह इनको कुचल डालने की धमकी नहीं देते. मेरे पत्रकारीय जीवन में याद नहीं कि किसी नेता ने सार्वजनिक सभा में समूचे पत्रकार समुदाय को पूंजीपतियों का दलाल कहा हो. नि:संदेह, पूंजीपतियों का निवेश मीडिया संस्थानों में है. पूंजीपति अगर कहीं धन लगाते हैं, तो उनका कुछ निहित उद्देश्य होता ही है. नयी अर्थव्यवस्था ने पूंजी का चरित्र, पूंजी नियंत्रित करनेवाले की सोच और व्यवहार में व्यापक परिवर्तन ला दिया है. लेकिन केजरीवाल जो कह रहे हैं, क्या सच वैसा ही है?
आखिर उनका वह भाषण उन चैनलों पर भी दिखाया गया, जिनके पीछे इनका धन लगा है. इसके पूर्व जब वे गैस का मामला उठा रहे थे, या उनके खिलाफ बोलते हुए इस्तीफे की बात कर रहे थे, तो वह भी उन चैनलों पर लाइव चल रहा था, जिनमें अंबानी का धन लगा हुआ है. जाहिर है, वे जिस तरह से पूरे पत्रकार समुदाय को पूंजीपतियों का दलाल साबित कर रहे हैं, वह पूरी तरह से सही नहीं है. कुछ लोग हो सकते हैं. अखबार या चैनल बगैर भारी पूंजी के नहीं चल सकता है. उस पूंजी का प्रभाव कई रूपों में हो रहा है, जो चिंताजनक है और जिससे कई बार पत्रकारीय सरोकार प्रभावित होते हैं. किंतु यह कहना कि पूंजीपति ऐसा करने के लिए पत्रकारों को दबाव में लाते हैं, सही नहीं है.
दूसरी ओर शिंदे साहब का गुस्सा भी कुछ ऐसा ही है. वे कहते हैं कि चार महीने से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक धड़ा कांग्रेस के बारे में खबरों से छेड़छाड़ कर रहा है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जो हो रहा है, यदि यह बंद नहीं हुआ, तो हम उसे कुचल देंगे. मीडिया को कुचलने की धमकी सरकार के किसी मंत्री या नेता द्वारा बहुत दिनों बाद सुनने को मिली है. देश का गृहमंत्री यदि ऐसा वक्तव्य दे, तो इससे पता चलता है कि आखिर सत्ता प्रतिष्ठान के अंदर पत्रकारिता को लेकर खीझ का भाव कितने गहरे स्तर पर है. हालांकि बाद में शिंदे ने स्पष्ट किया कि उन्होंने सोशल मीडिया के बारे में कहा था. लेकिन सोशल मीडिया के बारे में ही क्यों? इस ढंग का भाव किसी के अंदर कब पैदा होता है? सत्ता की ताकत का दंभ तो इसके पीछे होता ही है, लेकिन अपनी आलोचना के प्रति असहिष्णु होनेवाला समूह ही ऐसा सोच सकता है.
वर्तमान राजनीति का चरित्र ऐसा है, जहां ज्यादातर पार्टियों में ऐसे असहिष्णु लोग ऊपर से नीचे नेतृत्व के स्तर पर विराजमान हैं. कुछ दिनों पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मीडिया से बात करते हुए कहा था कि मीडिया बिना आधार के सरकार की नकारात्मक छवि पेश करता है, जिससे दुनिया भर में देश की छवि खराब होती है. समय-समय पर ऐसा बयान दूसरे दलों के नेता भी देते रहते हैं. शालीन परंपरा व आचरण यह है कि किसी समाचार-विचार से आपत्ति है, तो आप उसका खंडन जारी करिए. इसकी जगह कुचल डालने की धमकी लोकतांत्रिक नहीं अधिनायकवादी सोच को प्रतिबिंबित करता है.
हमारे राजनीतिक प्रतिष्ठान की समस्या यह है कि इस समय नेतृत्व के स्तर पर जो बैठे हैं, उनमें जनता के बीच आंदोलन, या निर्माण का कार्य कर यहां तक आनेवाले न के बराबर हैं. बिना संघर्ष और जन सेवा किये कोई पूरी तरह लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकता. ऐसे लोगों का हमारी राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान पर वर्चस्व है. वे अनावश्यक रूप से इस मुगालते में रहते हैं कि वे जो कुछ करते हैं वह सही है, उसे जनता का समर्थन है, पर मीडिया केवल उसमें नकारात्मक पहलू दिखाता है. चूंकि सच्चा लोकतांत्रिक संस्कार उनमें है नहीं, इसलिए वे एकदम दादा की शैली में अपशब्दों, विष-वमन व धमकियों पर उतर पड़ते हैं.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










