फांसी पर अदालत में संवैधानिक पेंच

मौत की सजा पाये कैदियों की लंबित दया याचिकाओं के निपटारे में देरी को आधार बनाते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को केंद्र सरकार ने चुनौती दी है. बहरहाल, मामले के कानूनी पक्ष पर तो फैसला तो अदालत में होगा, लेकिन इससे फांसी की सजा पर अरसे […]
मौत की सजा पाये कैदियों की लंबित दया याचिकाओं के निपटारे में देरी को आधार बनाते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को केंद्र सरकार ने चुनौती दी है. बहरहाल, मामले के कानूनी पक्ष पर तो फैसला तो अदालत में होगा, लेकिन इससे फांसी की सजा पर अरसे से चल रही बहस फिर तेज हो गयी है.
सरकार का कहना है कि आतंक को अन्य अपराधों के बराबर नहीं माना जा सकता, और दया याचिका के निपटारे का इंतजार सजायाफ्ता कैदियों के लिए वेदना का कारण नहीं, बल्कि उम्मीद की किरण है. सरकार ने याचिका में कहा है कि राष्ट्रपति से संबंधित संवैधानिक मामले तीन के बजाय पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ को सौंपा जाना चाहिए था, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार दया याचिका से संबंधित राष्ट्रपति का विशेषाधिकार अदालत के अधिकार में नहीं है. दया याचिका के निपटारे के इंतजार को सरकार द्वारा ‘उम्मीद की किरण’ कहना सही नहीं है.
जीवन भविष्य की कल्पना पर आधारित होता है, जिसके आधार पर मनुष्य अपना जीवन जीता है. लेकिन दया याचिका के फैसले की राह देखता सजायाफ्ता व्यक्ति भविष्य की कल्पना से वंचित हो जाता है. इंतजार भविष्य की कल्पना का त्रसद स्थगन है. भारत में मृत्युदंड की समाप्ति की मांग करनेवाले मानवाधिकारवादियों को सर्वोच्च न्यायालय के 21 जनवरी के फैसले से बड़ी ताकत मिली थी. तब केंद्र ने भी न्यायालय के फैसले के विरुद्ध याचिका की संभावना से मना किया था, लेकिन फिर भी उसने यह कदम उठाया. ‘आंख के बदले आंख’ से ‘आंख के बदले आंख के कानून से पूरी दुनिया अंधी हो जायेगी’ तक की यात्र में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसे चुनौती देकर केंद्र सरकार ने पीछे धकेलने की कोशिश की है.
संविधान-सभा ने मृत्युदंड के प्रश्न को आनेवाली संसद पर छोड़ा था. लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच व संवेदनहीनता ने किसी तरह की सैद्धांतिक बहस की संभावना को अवरुद्ध किया है. उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और सरकार की याचिका के संदर्भ में इस सजा से जुड़े विचार-विमर्श और दया याचिकाओं के निपटारे की निश्चित प्रक्रिया व सीमा पर अब गंभीरता से चरचा होगी और ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जायेगा.
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