सीबीआइ और सवाल

Updated at : 22 Feb 2017 6:29 AM (IST)
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सीबीआइ और सवाल

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने अपने पूर्व निदेशक एपी सिंह पर आपराधिक भ्रष्टाचार के आरोपी मोईन कुरैशी के साथ सांठगांठ रखने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की है. बीते एक महीने में देश की शीर्ष जांच एजेंसी के पूर्व मुखिया के ऐसे घेरे में आने की यह दूसरी घटना है. कुछ दिन पहले सर्वोच्च […]

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केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने अपने पूर्व निदेशक एपी सिंह पर आपराधिक भ्रष्टाचार के आरोपी मोईन कुरैशी के साथ सांठगांठ रखने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की है. बीते एक महीने में देश की शीर्ष जांच एजेंसी के पूर्व मुखिया के ऐसे घेरे में आने की यह दूसरी घटना है. कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के खिलाफ जांच का आदेश दिया था. उन पर कोयला घोटाले के कुछ अभियुक्तों को मदद पहुंचाने का शक है.
दोनों मामलों की जांच कर रही सीबीआइ की छवि के लिए यह एक बड़ा धक्का है. रिश्वत, पक्षपात और सरकार द्वारा दुरुपयोग के आरोप काफी समय से लगते ही रहे हैं. आज भी अक्सर देखा जाता है कि लोग राज्यों की पुलिस से अधिक भरोसा सीबीआइ पर करते हैं. लेकिन, अगर इस संस्था के शीर्ष पर बैठे लोगों पर ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगने लगें, तो यह प्रशासनिक तंत्र की साख के लिए बड़ी चिंता की बात है. सिन्हा को तो सीबीआइ की स्वायत्तता को नुकसान पहुंचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में ही फटकारा था.
तब उन्होंने अदालती आदेश की अवहेलना करते हुए तत्कालीन कानून मंत्री अश्विनी कुमार और अन्य सरकारी अधिकारियों को कोयला घोटाले से जुड़े दस्तावेज दिखाये थे. उनके जिम्मे टूजी घोटाले की जांच भी थी. बहरहाल, इन आरोपों की जांच का नतीजा क्या निकलता है और अदालत क्या फैसला लेती है, यह सब तो भविष्य के गर्भ में है, पर सीबीआइ के कामकाज के हिसाब-किताब को देखते हुए यह आशंका वाजिब है कि शायद कुछ नतीजा ही न निकले.
अगस्त, 2016 में लोकसभा में पेश जानकारी के आधार पर निकाले गये आंकड़े बताते हैं कि 2006 के बाद से सरकारी अधिकारियों से जुड़े जिन मामलों की जांच सीबीआइ ने की और जिनमें सुनवाई पूरी हुई, उनमें से एक-तिहाई से अधिक मामलों में अभियुक्त बरी हुए हैं. विश्वसनीयता के संकट के बीच एक राहत की बात है कि कई जांच अदालत की निगरानी में हैं. यह भी उल्लेखनीयहै कि सीबीआइ के पास मामले भी बड़ी संख्या में लंबित हैं और सरकारी दबाव की आशंकाओं को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है.
सिन्हा को फटकारते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जांच एजेंसी को ‘पिंजरे का तोता’ तक कह दिया था. ऐसे में यह जरूरी है कि सीबीआइ अपने पूर्व प्रमुखों के मामलों की जांच पूरी तत्परता और निष्पक्षता से करे, ताकि शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों को सबक भी मिले और एजेंसी की साख भी मजबूत हो सके.
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