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क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान

सांस्कृतिक और भाषाई विविधताओं के मनकों को एक सूत्र में पिरोकर ही भारत की कल्पना साकार होती है. समय ने भले ही लोगों को समाज, शिक्षा, व्यवसाय और तकनीकी संचार से जुड़ी विभिन्न भाषाओं के साथ जीने का आदी बना दिया है, पर हमारे अवचेतन की भाषा एक ही होती है. इसे हम मातृभाषा की […]

सांस्कृतिक और भाषाई विविधताओं के मनकों को एक सूत्र में पिरोकर ही भारत की कल्पना साकार होती है. समय ने भले ही लोगों को समाज, शिक्षा, व्यवसाय और तकनीकी संचार से जुड़ी विभिन्न भाषाओं के साथ जीने का आदी बना दिया है, पर हमारे अवचेतन की भाषा एक ही होती है.
इसे हम मातृभाषा की संज्ञा देते हैं. दरअसल, जन्म और हमारे संस्कारों के साथ चलनेवाली यह भाषा न केवल हमारे बोध को सुगम बनाये रखती है, बल्कि नवीनता, अनुसंधान और कलात्मकता के लिए उत्प्रेरक की तरह काम करती है. भाषाओं की विविधता और उनके संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से 1999 से हर साल 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है. परंतु भारत के संदर्भ में क्षेत्रीय भाषाओं और भाषाई संस्कारों को बचाये रखने की कवायद उससे कहीं पहले शुरू हो चुकी थी. सदियों से शासक वर्ग की भाषा को राजकाज और ज्ञानार्जन का माध्यम बना कर थोपा गया, चाहे वह अरबी-फारसी रही हों या फिर आधुनिकता की चोला ओढ़े आयी अंगरेजी.
अ‌वधी, मैथिली, मराठी और बांग्ला आदि भाषाएं आज भी घुट रही हैं. इस संदर्भ में उच्च न्यायालयों में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की संसदीय समिति की मांग स्वागत योग्य है. वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय समेत देश के 24 उच्च न्यायालयों के फैसले अंगरेजी भाषा में जारी होते हैं. ऐसे में कोलकाता, मद्रास, गुजरात, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक उच्च न्यायालयों में बंगाली, तमिल, गुजराती, हिंदी और कन्नड़ भाषा के इस्तेमाल के लिए भेजे गये प्रस्तावों पर सकारात्मक पहल करते हुए केंद्र को समावेशी कदम उठाने की जरूरत है.
हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ अक्तूबर, 2012 में भाषाओं में परिवर्तन की अपील को ठुकरा चुकी है. लेकिन, उच्च न्यायालयों में राज्य सरकार की मांग पर सूचीबद्ध भाषाओं के प्रयोग की छूट है. आम जन के व्यापक हित में न्यायालयों में भारतीय भाषाओं की सुविधा प्रदान करने के साथ-साथ सरकार को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भाषाओं के प्रचार-प्रसार की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए.
प्रारंभ में संविधान में 14 भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया था. वर्ष 1967 में सिंधी, 1992 में कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को और वर्ष 2004 में बोडो, मैथिली और संथाली को शामिल करने के बाद सूचीबद्ध भाषाओं की संख्या 22 हो गयी है. इस कवायद को जारी रखते हुए विचाराधीन 38 अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के संवर्धन की दिशा में काम करना चाहिए, जिससे भारतीयता को परिभाषित करनेवाले भाषाई संस्कार और भाषाई विविधता बरकरार रहे. इसी के साथ विभिन्न जनजातीय भाषाओं और बोलियों को बचाने की भी पुरजोर कोशिश की जानी चाहिए.
Prabhat Khabar Digital Desk
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