National Youth Day: स्वामी विवेकानंद केवल संत या विचारक नहीं हैं. वह भारत की शाश्वत परंपरा के महान प्रतीक हैं. वह उस चेतना का नाम हैं, जिसने पराजय, दारिद्रय और आत्मविस्मृति के अंधकार में डूबते भारत को उठकर खड़े होने का साहस दिया. उनका जीवन, चिंतन और उद्घोष भारतीय समाज के लिए दीपस्तंभ की तरह है, जो बताता है कि राष्ट्र का उत्थान आत्मबल, चरित्र और करुणा से होता है. उन्नीसवीं शती का भारत ऐतिहासिक उथल-पुथल से गुजर रहा था. वर्ष 1765 के बाद अंग्रेजी सत्ता के सुदृढ़ होते ही भारत अंग्रेजी शिक्षा, पाश्चात्य विज्ञान और आधुनिक विचारधाराओं के संपर्क में आया. व्यापार और शासन के साथ-साथ अंग्रेज अपनी बौद्धिक और शैक्षणिक संरचना भी लेकर आये, जिसने भारतीय समाज को आत्ममंथन के लिए विवश किया. उसी आत्ममंथन की कोख से आधुनिक भारत का आध्यात्मिक नवजागरण जन्मा. इस नवजागरण के केंद्र में रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद थे. रामकृष्ण मिशन का शुरू होना किसी पंथ-प्रसार का प्रयास नहीं था, बल्कि उपनिषदों में निहित वेदांत के ज्ञान को जीवन के व्यवहार में उतारने का संकल्प था. विवेकानंद ने अध्यात्म को कर्म से जोड़ा और सेवा को साधना का स्वरूप दिया.
विवेकानंद योगी थे, पर वह योग और साधना को रहस्य नहीं, बल्कि अनुशासन और अनुभव का विषय मानते थे. वह स्पष्ट कहते थे कि गुरु से प्रत्यक्ष संपर्क के बिना योग का अभ्यास श्रेयस्कर नहीं होता. यह कथन भारतीय ज्ञान-परंपरा की उस मूल भावना को पुनः स्थापित करता है, जिसमें ज्ञान पुस्तक से नहीं, बल्कि अनुभूति और अनुशासन से प्राप्त होता है. उनकी वाणी की गूंज इतनी प्रबल थी कि श्रीअरविंद जैसे महान साधक भी उससे प्रभावित हुए. श्रीअरविंद ने स्वीकार किया कि उनकी योग-साधना शास्त्राधारित न होकर अंतर अनुभूतियों पर आधारित थी और कारावास के दिनों में विवेकानंद की वाणी उनके लिए आलोक बन गयी थी. उन्होंने विवेकानंद को पढ़ा और जाना कि योग और अध्यात्म से भारतीय कैसे ऊर्जा प्राप्त करते हैं.
विवेकानंद की दृष्टि संकीर्ण नहीं थी, बल्कि बड़ी थी. उनके लिए भारत जातियों और वर्गों में बंटा समाज नहीं, बल्कि पीड़ित और उपेक्षित मनुष्यों का साझा परिवार था. वह निर्भीक होकर कहते थे कि अज्ञानी, दरिद्र, ब्राह्मण और चांडाल-सभी उनके भाई हैं. उनकी प्रार्थना थी कि ईश्वर उन्हें पहले मनुष्य बनाए. यह कथन मानवता के उस शाश्वत सत्य को उद्घाटित करता है, जिसे सात शताब्दियों पहले स्वामी रामानंदाचार्य ने गंगा किनारे काशी में कहा था. रामानंद और विवेकानंद के लिए व्यक्ति महत्वपूर्ण था, उसकी जाति नहीं.
आज का भारत अनेक उपलब्धियों के बावजूद गहन चुनौतियों से जूझ रहा है. नैतिक मूल्यों का क्षरण, सामाजिक असमानता और भय का वातावरण सामने है. ऐसे समय में विवेकानंद का स्मरण केवल उनके लिए श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि दिशा-बोध है. हर वर्ष उनकी जयंती युवा दिवस के रूप में इसलिए मनायी जाती है कि भारत अपने भाग्योदय के मंत्र को न भूले. विवेकानंद उस संन्यासी के रूप में हमारे सामने आते हैं, जिसने भारतीय ज्ञान की उजली माटी से विश्व के मस्तक पर चंदन का तिलक लगाया. वर्ष 1893 में शिकागो की धर्म संसद में दिया गया उनका ओजस्वी उद्बोधन आज भी भारत के आत्मगौरव का प्रतीक है. विवेकानंद की उपस्थिति देश के हर कोने में अनुभव की जा सकती है. वह कन्याकुमारी के गर्जन करते समुद्र से लेकर राजस्थान की मरुभूमि की माटी खेतड़ी तक सजीव हैं.
‘कठोपनिषद’ का अमर उद्घोष ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ यानी उठो, जागो और श्रेष्ठ जनों के संग से ईश्वर को समझो, उनके जीवन में साकार था. वह युवा पीढ़ी के पथप्रदर्शक हैं, क्योंकि उन्होंने पुरातन ज्ञान और आधुनिकता के बीच सेतु का निर्माण किया. भय, स्वार्थ और भ्रष्टाचार के दौर में विवेकानंद वट वृक्ष की भांति छाया देते हैं. जब चारित्रिक संवेदनाएं क्षीण हो रही हैं, तब वह चरित्र-निर्माण को शिक्षा का केंद्र बताते हैं. भगिनी निवेदिता जैसी विदेशी नारियां उनके माध्यम से भारत की आत्मा को पहचान सकीं और वेदों में निहित अध्यात्म की प्रतिष्ठा विश्वभर में हुई. उनका जीवन सादगी, बल और सौंदर्य का अद्भुत संगम था. न धन-संपत्ति का संचय, न वैभवपूर्ण मठ, फिर भी वह करोड़ों भारतीयों के हृदय में प्रतिष्ठित हैं, क्योंकि उनका प्रेम भारत माता के प्रति निष्कपट था.
वह मानते थे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और निर्भय व्यक्तित्व का विकास होना चाहिए. उनकी दृष्टि में सेवा और साधना अलग-अलग नहीं थीं, बल्कि मानवता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना थी. विवेकानंद ने भारतीय परंपरा को आधुनिकता से जोड़ते हुए सिद्ध किया कि प्राचीन ज्ञान और वैज्ञानिक चेतना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं. भारत के निर्माण की यात्रा में विवेकानंद का स्मरण इसलिए अनिवार्य है कि हमारी सच्ची और प्राचीन विरासत सुरक्षित रह सके. वह सिखाते हैं कि राष्ट्र केवल भूभाग नहीं, बल्कि चरित्र, करुणा और चेतना से निर्मित होता है. विवेकानंद भारत की आत्मा का वह जागरण हैं, जो आज भी प्रत्येक भारतीय से उठने, जागने और श्रेष्ठ बनने का आह्वान करता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

