Iran: ईरान इस्लामी गणराज्य की स्थापना के बाद के सबसे नाजुक दौरों में से एक से गुजर रहा है. दिसंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू हुआ आर्थिक संकट अब तेजी से राजनीतिक संकट में बदलता दिख रहा है. पश्चिम एशिया की प्रमुख शक्ति माने जाने वाले ईरान के लिए यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इसमें आर्थिक पतन, देशव्यापी जन-आंदोलन, सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर मतभेद और अंतरराष्ट्रीय दबाव, चारों तत्व एक साथ सक्रिय हैं. इस संकट की शुरुआत आर्थिक कारणों से हुई. वर्षों से चले आ रहे अमेरिकी प्रतिबंध, आंतरिक आर्थिक कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और संरचनात्मक कमजोरियों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को पहले ही खोखला कर दिया था. दिसंबर के अंत में जब महंगाई बेकाबू हुई, तब आवश्यक वस्तुओं की कमी बढ़ी और ईरानी मुद्रा में तेज गिरावट आई, तो असंतोष सड़कों पर फूट पड़ा. तेहरान के बाजारों से शुरू हुए विरोध-प्रदर्शन देखते ही देखते देश के लगभग सभी प्रांतों और प्रमुख शहरों तक फैल गये.
शुरुआत में प्रदर्शनकारी महंगाई पर नियंत्रण, रोजगार और जीवन-यापन की बेहतर स्थितियों की मांग कर रहे थे. पर बहुत कम समय में ये मांगें राजनीतिक स्वरूप ले चुकी हैं. अब सड़कों पर केवल आर्थिक राहत की बात नहीं हो रही, बल्कि इस्लामी शासन की वैधता पर ही सवाल उठाये जा रहे हैं. सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनेई के खिलाफ नारे लगना और मौलवी-शासित व्यवस्था के अंत की मांग करना इस बेचैनी को स्पष्ट करता है. शाह के जमाने के झंडों का लहराया जाना और रजा पहलवी की तस्वीरों का दिखना इस बात का संकेत है कि विरोध पूरी राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ है. ईरानी शासन ने व्यापक दमनकारी उपाय अपनाये हैं-हजारों गिरफ्तारियां, सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग, डराने-धमकाने की नीति और पूरे देश में इंटरनेट बंद कर देना इसके सबूत हैं.
न्यायपालिका और सुरक्षा प्रतिष्ठान के बयान बेहद सख्त हैं. प्रदर्शनकारियों को ‘खुदा का दुश्मन’ करार देने की चेतावनी दी गयी है, जो ईरानी कानून के तहत मृत्युदंड तक ले जा सकती है. यह भाषा संकेत देती है कि शासन इस आंदोलन को कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट मान रहा है. इस संकट को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि शासन के भीतर इस पर एक राय नहीं दिखती. राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से संयम बरतने और हिंसा से बचने की अपील की है. इसके पीछे या तो वास्तविक चिंता है या यह स्वीकारोक्ति कि केवल बल प्रयोग से वैधता बहाल नहीं की जा सकती. इसके उलट, न्यायपालिका, रिवोल्यूशनरी गार्ड और सर्वोच्च नेता के करीबी हलकों से कठोर कार्रवाई के संकेत मिल रहे हैं. ईरानी व्यवस्था के लिए यह आंतरिक मतभेद खतरनाक हैं, क्योंकि अतीत में सत्ता प्रतिष्ठान की एकजुटता ही ऐसे आंदोलनों से निपटने का सबसे बड़ा आधार रही है.
दशकों से बिखरा हुआ और देश से बाहर रहा विपक्ष इस मौके को अवसर के रूप में देख रहा है. पूर्व शाह के बेटे रजा पहलवी खुले तौर पर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सामने आये हैं. उन्होंने शहरों के केंद्रों पर कब्जा करने और सार्वजनिक स्थानों पर डटे रहने की अपील की है. भले ही ईरान के भीतर उनकी वास्तविक संगठनात्मक क्षमता सीमित हो, पर सड़कों पर राजशाही से जुड़े प्रतीकों का उभरना दिखाता है कि मानसिक स्तर पर बड़ा बदलाव हो रहा है. यह आंदोलन अब एक उत्तर-इस्लामी गणराज्य की कल्पना की ओर बढ़ रहा है, चाहे वह अभी अस्पष्ट ही क्यों न हो. वैश्विक माहौल भी ईरान के लिए अनुकूल नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या हुई, तो अमेरिका कड़ी कार्रवाई कर सकता है. अमेरिकी विदेश और वित्त अधिकारियों के बयान भी ईरानी जनता के समर्थन और शासन पर दबाव की ओर इशारा करते हैं.
यूरोपीय संघ, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने दमन की निंदा की है, जबकि मानवाधिकार संगठन इंटरनेट बंदी की आड़ में बड़े पैमाने पर हिंसा की आशंका जता रहे हैं. ईरान का यह दावा, कि अमेरिका और इस्राइल अशांति भड़का रहे हैं, घरेलू स्तर पर समर्थकों को संतुष्ट कर सकता है, पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उसे खास समर्थन नहीं मिला है. इसने ईरानी नेतृत्व को दुविधा में डाल दिया है. कठोर दमन से अंतरराष्ट्रीय अलगाव और नये प्रतिबंधों का खतरा है, जबकि नरमी से आंदोलन के और तेज होने की आशंका. आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि शासन के पास असंतोष को शांत करने के लिए बड़े आर्थिक पैकेज देने की गुंजाइश भी नहीं बची है. इसी कारण यह संकट पिछले आंदोलनों की तुलना में खतरनाक है.
भारत के लिए यह स्थिति केवल दूर की राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है. ईरान भारत की कनेक्टिविटी, ऊर्जा और भू-राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा है. चाबहार बंदरगाह, जिसमें भारत ने भारी निवेश किया है, पाकिस्तान को बाइपास करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और आगे तक पहुंच का प्रमुख जरिया है. यदि ईरान में लंबे समय तक अस्थिरता रहती है या सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव होता है, तो इन परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है और भारत की रणनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है. चीन का पहलू भी महत्वपूर्ण है. यदि ईरान और अधिक अलग-थलग पड़ता है, तो बीजिंग वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, जिससे पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलन बदल सकता है. ऐसे में भारत का उद्देश्य किसी विशेष ईरानी गुट का समर्थन करना नहीं, बल्कि स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित करना है, ताकि दीर्घकालिक रणनीतिक हित सुरक्षित रह सकें.
अब तक भारत की नीति इसी व्यावहारिक सोच को दर्शाती है. तेहरान के शीर्ष नेतृत्व के साथ संवाद बनाये रखना और उच्चस्तरीय संपर्क जारी रखना इसी रणनीति का हिस्सा है. साथ ही, भारत को अमेरिकी दबाव और मानवाधिकार संबंधी वैश्विक चिंताओं के बीच संतुलन साधना है. ब्रिक्स की अध्यक्षता के वर्ष में भारत स्वयं को वैश्विक दक्षिण की जिम्मेदार आवाज के रूप में पेश करना चाहता है, और ईरान के संदर्भ में यह संतुलन और भी संवेदनशील हो जाता है. अंततः, ईरान का मौजूदा संकट केवल अर्थव्यवस्था, प्रदर्शन या विदेशी दबाव का मामला नहीं है; यह वैधता का संकट है. एक ऐसी पीढ़ी सड़कों पर है, जो आर्थिक रूप से पिसी हुई, राजनीतिक रूप से हाशिये पर और सांस्कृतिक रूप से शासक व्यवस्था से कटी हुई महसूस करती है. शासन इस चुनौती से कैसे निपटता है, वह ईरान के भविष्य के साथ पूरे पश्चिम एशिया की रणनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

