पाकिस्तान : जो सबके काम आये

।। वुसतुल्लाह खान।। (बीबीसी पाकिस्तान के संवाददाता) कमोबेश हर मोहल्ले में बारह-चौदह बरस तक का एक कैरेक्टर पाया जाता है, जिसके मां-बाप आम तौर पर गरीब होते हैं. इस कैरेक्टर का सरपरस्त पूरा मोहल्ला होता है. किसी का सौदा-सामान ला दिया, किसी के पांव दबा दिये, गाड़ी धो दी, फर्श की सफाई कर दी, किसी […]
।। वुसतुल्लाह खान।।
(बीबीसी पाकिस्तान के संवाददाता)
कमोबेश हर मोहल्ले में बारह-चौदह बरस तक का एक कैरेक्टर पाया जाता है, जिसके मां-बाप आम तौर पर गरीब होते हैं. इस कैरेक्टर का सरपरस्त पूरा मोहल्ला होता है. किसी का सौदा-सामान ला दिया, किसी के पांव दबा दिये, गाड़ी धो दी, फर्श की सफाई कर दी, किसी के बच्चे को खिला-पिला दिया, गोद में लेकर घुमा दिया, मोहल्ले के चक्कर काटनेवाले किसी संदिग्ध आदमी को पकड़वा दिया, कभी सब्जीवाले के पास खड़ा हो गया, तो कभी नाई के पास बैठ गया.
सिगरेट-चाय ला दी और फिर हैरत से मुंह खोल कर कुछ लोगों की बातें सुनने लगा. कभी समझ कर, तो कभी नासमझी में सिर हिला दिया या मुस्करा दिया. इस कैरेक्टर के मां-बाप ने यकीनन कभी उसका कोई नाम रखा होगा, लेकिन पूरे मोहल्ले को इसका असल नाम जानने या उसे पुकारने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है. इसका ख़ुद-ब-ख़ुद कोई जेनेरिक सा नाम पड़ जाता है. और फिर यही उसकी पहचान बन कर चिपक जाता है. कहीं बख्शू, कहीं भोला, कहीं छोकरा, तो कहीं जैदा जैसा कोई भी नाम उसे दे दिया जाता है. कोई खाना खिला देता है, कोई ईद, त्योहार, शादी या ग़मी पर एकाध नया या पुराना जोड़ा जूता दे देता है. किसी मवाली ने कभी चरस पिला दी तो किसी ने जुए की नाल थमा दी. किसी काम, किसी बात से इनकार नहीं. सबकी आंखों का तारा ये बख्शू, भोला, छोकरा, जैदा.
जब ये बख्शू, भोला या जैदा जवान होता जाता है, तो फिर इसे घरेलू काम देने की बजाय बाहर के काम दिये जाते हैं और फिर वह मोहल्ले या इलाके की किसी रसूखवाली सियासी या समाजी हस्ती की बैठक या चौपाल का हिस्सा बन जाता है. साहब ने कहा तो काम कर दिया, वरना पैर हिलाता रहा और जब इसके बालों में सफेदी उतरने लगती है तो नये बच्चे इसे कोई इज्जतदार नाम दे देते हैं जैसे कि बख्शू चाचा, हाजी जैदा, भोला साईं वगैरह. और एक दिन वह मर जाता है या गायब हो जाता है. कुछ दिनों तक उसका जिक्र रहता है और फिर मोहल्ला उस जैसे किसी और को बख्शू, भोला, छोकरा, जैदा, चाचा, हाजी और साईं का ताज पहना देता है.
मुङो पाकिस्तान भी बख्शू जैसा लगने लगा है जो सबके काम आता है, भले ही उसके काम दूसरे आयें या न आयें. यार बख्शू, कोरिया में लड़ाई हो रही है, अपने कुछ फौजी ले आ. अच्छा साहब. बख्शू जरा रूस की जासूसी करनी है, एक हवाई अड्डा दे. कोई सा भी ले लो साहब. ओए बख्शू! ये चिट्ठी ले और भाग कर चीनवालों को दे आ. अभी गया साहब. अबे सिर्फ चिट्ठी देकर आया, जवाब क्या तेरा बाप ले कर आयेगा? अभी फिर से जाता हूं साहब. बख्शू, फलीस्तीनियों को फंटी लगानी है, जरा दो-चार तगड़े लोग तो जॉर्डन भेज. अभी भेजता हूं साहब. अबे बख्शू, दुबई में जल्दी से कुछ मजदूर तो भेजो. कुछ सड़कें, इमारतें, एयरपोर्ट और महल बनवाने हैं. जी साहब, अभी पकड़ के लाया. और ये ले अपना खर्चा-पानी. मेहरबानी साहब. मियां बख्शू, ले पकड़ बंदूक और अफगानिस्तान को मार आ. मगर साब? अबे जा ना. ये ले पैसे. रास्ते में जरूरत पड़ेगी. अब मुंह क्या देख रहा है. जमानत की फिक्र न कर, मैं करवा दूंगा. ठीक है साब, आपके लिए जाता हूं. बख्शू जरा ध्यान से सुन. मैं ड्रोन अटैक करने वाला हूं, मगर सामने नहीं आऊंगा, तुङो आगे कर दूंगा, तू कबूल कर लेना. क्या समझा? जी समझ गया.
ले ये चाबी और वो जो मेरा मुंशी है ना बाला, उसकी मोटरसाइकिल अपने पास रख ले. बाले को नयी दिलवा दूंगा. मगर साब, मुङो तो मोटरसाइकिल चलानी ही नहीं आती. ओए भाई मैं सिखाने के लिए बाले की ड्यूटी लगा दूंगा. जा प्यारे फटाफट. और भूलना नहीं वो अटैक वाली बात. बिल्कुल साब, आप बेफिक्र रहो. यार भाई बख्शू, आप तो हमें भूल ही गये. क्यों शर्मिदा करते हो साब, आपको खुद आने की क्या जरूरत थी, हुक्म करते बख्शू सिर के बल चल कर आता. बस हाजी एक तो तुमसे बहुत दिन से मिले नहीं थे, दूसरा तुम्हें एक तकलीफ देनी थी. सीरिया जानेवाले कुछ लड़कों को ट्रेनिंग देनी है. सबने कहा कि हाजी बख्शू से बेहतर भला ट्रेनिंग कौन दे पायेगा. ब़ेफिक्र हो जाओ साब. समझ लो ट्रेनिंग हो गयी. और हां, वो बहरीन वाले कह रहे थे कि आप हमारी तरफ से बख्शू हाजी का शुक्रि या अदा कर देना जिसके बंदों ने बहरीन के विद्रोहियों की तबीयत साफ करके रख दी. बस साब, बख्शू को आप जैसों की दुआओं के अलावा और क्या चाहिए. मगर साब मेरा भी एक काम बहुत दिन से फंसा हुआ है. किसी तरह दहशतगर्दी से बख्शू गरीब की जान तो छुड़ा दो, दुआएं दूंगा. अरे छुड़वा देंगे जान भी. तुङो तो हर वक्त अपनी ही पड़ी रहती है हाजी. पहले इन लड़कों को ट्रेनिंग तो दे दे. ठीक है साब जैसा आप कहें. और सुन जरा जल्दी कर. अच्छा साब ये भी हो जाएगा. बख्शू को और कोई हुक्म? (बीबीसी से साभार)
और कुछ कविता
फागुन के महीने में पढ़िए, धर्मवीर भारती की यह कविता :
इक पीली-सी चिड़िया
उसका कुछ अच्छा-सा नाम है!
मुङो पुकारे!
ताना मारे
भर आएं, आंखड़ियां!
उन्मन, ये फागुन की शाम है!
घाट की सीढ़ी तोड़-तोड़ कर बन-तुलसा उग आयीं
झुरमुट से छन जल पर पड़ती सूरज की परछाईं
तोतापंखी किरनों में हिलती बांसों की टहनी
यहीं बैठक कहती थी तुमसे सब कहनी-अनकहनी
आज खा गया बछड़ा मां की रामायन की पोथी!
अच्छा अब जाने दो मुझको घर में कितना काम है!
इस सीढ़ी पर, यहीं जहां पर लगी हुई है काई
फिसल पड़ी थी मैं, फिर बांहों में कितना शरमायी!
यहीं न तुमने उस दिन तोड़ दिया था मेरा कंगन! / यहां न आऊंगी अब, जाने क्या करने लगता मन!
लेकिन तब तो कभी हममें तुममें पल-भर बनती!
तुम कहते थे जिसे छांह है, मैं कहती थी घाम है!
अब तो नींद निगोड़ी सपनों-सपनों भटकी डोले / कभी-कभी तो बड़े सकारे कोयल ऐसे बोले
ज्यों सोते में किसी विषैली नागिन ने हो काटा / मेरे संग-संग अक्सर चौंक-चौंक उठता सन्नाटा
पर फिर भी कुछ कभी नह जाहिर करती हूं इस डर से
कहीं न कोई कह दे कुछ, ये ऋतु इतनी बदनाम है!
ये फागुन की शाम है!
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