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‘गईया के समान बेटी घर में रखाय, एक से खुले तो दूजे खूंटवा बंधाय’- भारतीय स्त्री के अस्तित्वगत दुख को व्यक्त करनेवाली ऐसी बेधक पंक्ति शायद ही कोई दूसरी हो. सबका कोई न कोई देश होता है या हो सकता है. लेकिन स्त्री का देश? उसका देश अभी तक बना नहीं शायद! मायके और ससुराल […]

‘गईया के समान बेटी घर में रखाय, एक से खुले तो दूजे खूंटवा बंधाय’- भारतीय स्त्री के अस्तित्वगत दुख को व्यक्त करनेवाली ऐसी बेधक पंक्ति शायद ही कोई दूसरी हो. सबका कोई न कोई देश होता है या हो सकता है. लेकिन स्त्री का देश? उसका देश अभी तक बना नहीं शायद!
मायके और ससुराल के बीच वह दरम्यानी जगह नहीं बन पायी है अब तक कि वह चाहे, तो वहां अपने लिए एक सुरक्षित ठिकाना बना ले. इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि पिता या पति के धन-संपदा में बेटी या पत्नी के रूप में स्त्री के अधिकार को सुनिश्चित करते कानून देश में मौजूद हैं, परंतु बात जब इस अधिकार को देने की आती है, तो ससुराल और मायके का पुरुष-पक्ष सोच ही नहीं पाता कि स्त्री भी बाकियों की तरह परिवार का एक सदस्य है और मायके या ससुराल में उसका भी हिस्सा है.
किसी को उसके हिस्से की वाजिब संपदा से वंचित करना सिर्फ धोखा या लालचभर का मामला नहीं है. यह क्रूरतम हिंसाओं में से एक है, क्योंकि किसी को वंचित करने का मतलब उस व्यक्ति को उसके भविष्य से वंचित करना है. बगैर संपदा के कोई भी व्यक्ति ऐसे भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता, जिसे अपनी मर्जी से गढ़ने का उसे अख्तियार हो. स्त्री के भविष्य को अपनी मुट्ठी में कैद रखने की सोच का परिचय देते मामले अदालतों के दरवाजे तक आये दिन आते रहते हैं.
हाल-फिलहाल ऐसा ही एक मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, जिसमें भाई अपनी मृत बहन की संपत्ति पर अधिकार चाह रहा था. दूसरा मामला उन दो बहनों का है, जो अपने पिता के बनाये मकान पर काबिज किरायेदार को मकान खाली करने के लिए कह रही थीं, पर किरायेदार यह कह कर उनके दावे को चुनौती दे रहा था कि तुम बहनों की शादी हो चुकी है, इसलिए तुम लोग अपने पिता के मकान पर अपनी मिल्कियत की दावेदारी नहीं कर सकतीं.
अदालत ने पहले मामले में फैसला दिया कि बहन को ससुराल से कोई संपत्ति हासिल होती है, तो उस पर मायके के किसी सदस्य का कोई दावा नहीं हो सकता है और दूसरे मामले में कहा कि ब्याह हो जानेभर से मायके की संपदा पर स्त्री का हक खारिज नहीं हो जाता. बेशक ये फैसले स्त्री के अधिकारों पक्ष में हैं, मगर यहां मार्के की बात है स्त्री की संपदा पर काबिज होने की सामाजिक सोच. कहीं गहरे में हमारा पुरुष-प्रधान समाज आज भी यह नहीं मान पाया है कि संपदा पर स्त्री का भी अधिकार होता है. इस संदर्भ में न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए लड़ाई दो मोरचों पर लड़ी जानी है. एक तरफ धन हथियाने की इस गलत सोच को खारिज करना होगा और दूसरी तरफ स्त्री को अपने अधिकारों की खातिर और अधिक मुखर होना होगा.
Prabhat Khabar Digital Desk
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