सरकार को फटकार
Updated at : 10 Feb 2017 6:29 AM (IST)
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गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सुरक्षा ठिकानों पर आतंकी हमले रोकने में विफल रहने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की है. जम्मू-कश्मीर के उड़ी, हंदवारा, नगरोटा, पंपोर और बारामुला में हुए हमलों का हवाला देते हुए समिति ने कहा है कि पिछले साल के शुरू में पठानकोट सैन्य ठिकाने पर हमले से […]
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गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सुरक्षा ठिकानों पर आतंकी हमले रोकने में विफल रहने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की है. जम्मू-कश्मीर के उड़ी, हंदवारा, नगरोटा, पंपोर और बारामुला में हुए हमलों का हवाला देते हुए समिति ने कहा है कि पिछले साल के शुरू में पठानकोट सैन्य ठिकाने पर हमले से कोई सबक नहीं लिया गया और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा चाक-चौबंद करने के समुचित उपाय नहीं किये गये.
हालांकि, सरकार की ओर से सघन छापेमारी, लेजर और अन्य तकनीकों के जरिये घुसपैठ रोकने, भारत-पाक सीमा पर चौकियों की सुरक्षा का आकलन तथा जासूसी तंत्र को मजबूत करने के साथ सहयोगी एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल बनाने जैसे उपायों की बात कही गयी, पर समिति ने इसे अपर्याप्त माना है. पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों के विस्तार का फायदा उठा कर आतंकियों और तस्करों की लगातार घुसपैठ की कोशिश करता रहता है. पाक सेना द्वारा समर्थित हाफिज सईद, मसूद अजहर, सैयद सलाहुद्दीन जैसे अनेक सरगना सांगठनिक रूप से भारत को अस्थिर करने का प्रयास करते रहते हैं.
वैश्विक समुदाय के दबाव के बावजूद पाकिस्तानी सरकार आज भी भारत के विरुद्ध आतंक और हिंसा को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाये हुए है. ऐसे में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कूटनीतिक कोशिशों के साथ यह भी जरूरी है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र मुस्तैद रहे. आतंकी हमले के अलावा छद्म युद्ध का एक और दावं सरकारी वेबसाइटों की हैंकिंग भी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2013 और 2016 के बीच केंद्र और राज्य सरकारों की 700 से अधिक साइटों पर हमला हुआ है, जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी), आयुध फैक्टरी और रेल मंत्रालय के साइट भी शामिल हैं.
अनेक मामलों में गिरफ्तारियां हुई हैं और कुछ मामलों में दोषियों को सजा भी दी गयी है, पर इनके पीछे पड़ोसी देशों में बैठे भारत-विरोधी तत्वों के सुनियोजित षड्यंत्र के सुराग भी पर्याप्त मात्रा में मिले हैं. इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को अनेक स्तरों पर चौकस रहने की जरूरत है. अक्सर ऐसा देखा गया है कि हमले के तुरंत बाद सुरक्षा उपायों को बढ़ाने को लेकर सक्रियता बढ़ जाती है, पर जल्दी ही ढीलापन दिखने लगता है.
दो दिन पहले एनएसजी के मुख्यालय में तस्करों और उनका पीछा कर रहे स्वयंभू संगठनों का धड़ल्ले से घुस जाना व गोलीबारी करना सुरक्षा-व्यवस्था में ढील का चिंताजनक उदाहरण है. उम्मीद है कि सरकार संसदीय समिति के सुझावों पर तुरंत ध्यान देगी और आतंकी इरादों को नेस्तनाबूद करने के हरसंभव उपाय करेगी.
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