कभी खुशी कभी गम

Updated at : 06 Feb 2017 6:44 AM (IST)
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कभी खुशी कभी गम

वीर विनोद छाबड़ा व्यंग्यकार रेलवे स्टेशन के आस-पास रहने के अपने मजे हैं और दुख भी. हम तो 22 साल रहे हैं. हम कुछ एक्स्ट्रा ही खुशकिस्मत रहे. सामने उत्तर रेलवे और दायें बाजू पूर्वोत्तर रेलवे. और खिड़की से साफ-साफ दिखता उसका क्लॉक टॉवर. जब तक हम वहां रहे, रिस्ट वाॅच या टेबुल क्लॉक की […]

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वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

रेलवे स्टेशन के आस-पास रहने के अपने मजे हैं और दुख भी. हम तो 22 साल रहे हैं. हम कुछ एक्स्ट्रा ही खुशकिस्मत रहे. सामने उत्तर रेलवे और दायें बाजू पूर्वोत्तर रेलवे. और खिड़की से साफ-साफ दिखता उसका क्लॉक टॉवर. जब तक हम वहां रहे, रिस्ट वाॅच या टेबुल क्लॉक की हमें जरूरत नहीं पड़ी. खिड़की खोली और टाईम देख लिया. दस कदम आगे दायें चले नहीं कि राजकीय बस अड्डा. चौबीस घंटे बस सेवा. सामने सिटी बस अड्डा. घर से निकले नहीं कि रिक्शा-तांगा भी हाजिर. कभी इंतजार नहीं करना पड़ता. मुसाफिरों का आना-जाना तो कभी थमता ही नहीं. रात कोई मेहमान आ जाये और मेमसाब मायके गयी हों या गैस खत्म हो, फिर भी मेहमान भूखा नहीं सो सकता. मुसाफिरों के लिए बाजार और होटल तो चौबीस घंटे खुले ही हैं.

हमने तो बरसों मॉर्निंग वॉक की है रेलवे प्लेटफॉर्मों पर. सुबह-सुबह मुंह में दातौन दबाया और चल दिये. एक नंबर के लंबे प्लेटफॉर्म के एक छोर से दूसरे छोर तक. हम लोग इसे मॉर्निंग वॉक नहीं, शंटिंग बोलते थे.

हम तिमंजिले पर रहा करते थे. दोनों स्टेशनों का नजारा साफ दिखता था. स्टेशन से निकलती भीड़ देख कर बता देते थे कि पंजाब मेल है या गुवाहाटी एक्सप्रेस. कहीं जाना होता था तो दस मिनट पहले निकलते. दो मिनट नहीं लगे कि प्लेटफॉर्म पर हाजिर. अब चूंकि रेलवे कॉलोनी में रहते थे, सो कोई टीटी तो कोई गार्ड. कहीं भी आना-जाना फ्री समझो. बनारस और दिल्ली तो यूं जाते थे, जैसे बाजार टहलने जा रहे हैं.

स्टेशन के सामने रहने के नुकसान भी हैं. हमें याद है, जब तक हम स्टेशन के सामने रहे, हमारी मित्र सूची अनावश्यक रूप से बहुत लंबी रही. रात-बेरात खट-खट हुई. दरवाजा खोला. धक्का देते हुए आधा दर्जन बच्चों के साथ धड़धड़ा कर रिश्तेदार अंदर. ट्रेन पूरे चार घंटा लेट है.

दस किमी लौट कर जाना घर जाना कोई समझदारी तो है नहीं. और फिर वहां प्लेटफॉर्म इतना गंदा है कि पूछाे मत. सोचा आप ही के घर विश्राम कर लिया जाये. इसी बहाने कुछ गप-शप हो जायेगी. बच्चे थोड़ी नींद मार लेंगे.

रात दस बजे एक मित्र परिवार सहित आ धमके. ट्रेन रात दो बजे छूटनी है. इतनी रात गये अकबरी गेट से रिक्शा बड़ी मुश्किल से मिलता है भाई साब. मिल भी जाये, तो खतरा कौन मोल ले? भलाई का जमाना तो है नहीं. तीन छोटे-छोटे बच्चे और ऊपर से जवान ननद.

रात बारह बजे घंटी बजी. मेहमान हाजिर. क्या करें? ट्रेन लेट हो गयी है. ठंड बहुत ज्यादा है. दूर-दूर तक घना कोहरा. अगर बच्चे साथ नहीं होते, तो जैसे-तैसे चले भी जाते. अब सुबह ही निकलेंगे. चलो बच्चों घुस जाओ, भैया और चाचा की रजाईयों में.

बहुत नजदीकी वाले मेहमान तो डिनर पर हाथ साफ करने से भी नहीं हिचके. अन्यथा मेहमान का दर्जा तो हासिल है, चाय-पानी पूछना तो बनता ही था.

याद नहीं है हमें कि किसी को इनकार करते हुए कभी कोई देखा हो. घर न हुआ रेलवे का विश्रामगृह हो गया. कई बार तो ऐसा हुआ कि मेहमान खटिया पर और हम छत पर सोने चले गये या बरामदे में जमीन पर दरी बिछा कर लेट गये. नींद कोसों दूर रही. करवटें बदलते रहे. ऐसे-ऐसे मेहमानों का आना हुआ, जिनसे दूर-दराज का रिश्ता रहा.

कई बार तो रिश्तेदारों के पड़ोसी आ धमके. कई लोग तो पिताजी से सिफारिश लगवाने आये कि आप रेलवे में हैं और आपकी काफी जान-पहचान होगी. माता का बुलावा आया है. जम्मू का रिजर्वेशन चाहिए. हमें लगता है कि रेलवे स्टेशनों के आस-पास रहनेवालों के साथ आज भी कमो-बेश यही स्थिति है.

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