आर्थिक सर्वेक्षण के संकेत
Updated at : 01 Feb 2017 1:11 AM (IST)
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वह समीक्षा ही कैसी, जिसमें पक्षपात हो! लिहाजा वित्त मंत्री के बजट-भाषण से एक दिन पहले पेश की जानेवाली आर्थिक समीक्षा को साल भर के हालात का वस्तुनिष्ठ आकलन और भावी समय के लिए एक किस्म का नीति-निर्देश समझा जाना चाहिए. इसी सोच से देश के पहले प्रधानमंत्री ने 1958-59 में बजट-भाषण के वक्त कहा […]
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वह समीक्षा ही कैसी, जिसमें पक्षपात हो! लिहाजा वित्त मंत्री के बजट-भाषण से एक दिन पहले पेश की जानेवाली आर्थिक समीक्षा को साल भर के हालात का वस्तुनिष्ठ आकलन और भावी समय के लिए एक किस्म का नीति-निर्देश समझा जाना चाहिए. इसी सोच से देश के पहले प्रधानमंत्री ने 1958-59 में बजट-भाषण के वक्त कहा था कि आर्थिक समीक्षा में मौजूदा वर्ष की देश की आर्थिक स्थितियों का जिक्र कुछ ऐसे होना चाहिए कि बजट की प्राथमिकताओं का पता चले. साथ ही, यह समीक्षा सरकार के सोच से तनिक स्वतंत्र भी होनी चाहिए.
नेहरू का वाक्य था कि समीक्षा में आर्थिक घटनाओं और नीतियों की अलग-अलग व्याख्या होनी चाहिए, ताकि वह बजट पर होनेवाली बहस में सांसदों के लिए मददगार साबित हो. अगर इस दस्तावेज के बारे में ऊपर की बातों से आप सहमत हैं, तो फिर यह बात बेखटके कही जा सकती है कि मंगलवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में जोर आर्थिक हालात के वस्तुनिष्ठ आकलन पर कम और आर्थिक नीतियों के बचाव पर ज्यादा है. चूंकि जोर नीतियों के बचाव पर ज्यादा है, इसलिए वित्त मंत्री के बजट-भाषण पर जब बहस होगी, तो यह समीक्षा सांसदों के लिए कम मददगार साबित होगी.
इसका संदर्भ पहले से बन चुका था. नोटबंदी के फैसले के बाद एक तो अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसियों ने आर्थिक वृद्धि दर के घटने की आशंका के साथ भारत की रेटिंग कम की थी. दूसरे, नोटबंदी के बाद आये आकलन में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने आधिकारिक तौर पर कह दिया था कि भारत की वृद्धि दर 2016-17 में कम (6.6 फीसदी) होगी और 2017-18 में भी यह अधिक-से-अधिक 7.2 फीसदी ही रहेगी.
इन प्रतिक्रियाओं के साथ सरकार की नजर में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का वह भाषण भी खटक रहा होगा, जिसमें उन्होंने नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी नकारात्मक असर होने और जीडीपी के दो फीसदी कम होने की बात कही थी. इसी टेक पर कांग्रेस ने संसद में आर्थिक समीक्षा पेश होने से तुरंत पहले एक छोटी सी किताब जारी कर लोगों को समझाना चाहा कि अर्थव्यवस्था बहुत अच्छी नहीं है. निवेश, निर्यात और रोजगार में कमी आयी है. यूपीए शासन के दस वर्षों की औसत विकास दर (7.5 फीसदी) को बरकरार रखने में मौजूदा सरकार अभी तक नाकाम रही है.
जाहिर है, सर्वेक्षण को पेश करते समय नोटबंदी के फैसले की आलोचनाओं को नकारने की जरूरत वित्त मंत्री महसूस कर ही रहे होंगे. सरकार अब भी यही कह रही है कि नोटबंदी के नतीजे सकारात्मक होंगे. सरकार का जोर लोगों को यह समझाने पर है कि नोटबंदी कोई एकतरफा घटना नहीं थी. बेशक नकदी की आपूर्ति कम हुई है, लेकिन नकद जमा बढ़ा है. अगर बैंकों का मौजूदा जमा टिकाऊ साबित होता है, तो कर्ज की दरें कम होंगी. कर्ज के विस्तार के साथ बढ़ी हुई खरीद-क्षमता के बीच अर्थव्यवस्था में उत्पादन-उपभोग का चक्र बढ़ेगा, आर्थिक खुशहाली आयेगी.
कहा गया है कि नोटबंदी के बाद कैशलेस लेन-देन की तरफ लोगों का रूझान बढ़ता रहा, तो भ्रष्टाचार में कमी आयेगी और नियंत्रण-निगरानी के नये उपायों के कारण अघोषित आमदनी नियंत्रित होगी. यह तो स्वीकार किया गया है कि नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था की रफ्तार में तात्कालिक तौर पर थोड़ी कमी आयी है, पर यह भी कहा गया है कि देश इस कमी से जल्दी ही उबरेगा. चालू वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर 6.75 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत के बीच रहेगी. यह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विपक्ष के पूर्वानुमान से कहीं ज्यादा है.
वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए यह तो माना कि औद्योगिक वृद्धि-दर पिछले साल के मुकाबले तकरीबन दो फीसद कम रही है, लेकिन यह भी रेखांकित किया कि कृषि क्षेत्र में शानदार प्रगति हुई है, क्योंकि वृद्धि दर चार फीसदी से ज्यादा है. ऐसा कहते हुए देश की खेती की कुछ तल्ख सच्चाईयां वित्त मंत्री से छूट गयीं. बेशक इस साल खरीफ की फसल अच्छी हुई और रबी की बुवाई का रकबा बीते साल की तुलना में बढ़ा हुआ नजर आ रहा है.
प्रधानमंत्री ने भी 31 दिसंबर वाले भाषण में इस तरफ ध्यान दिला कर नोटबंदी के फैसले की वकालत की थी. बहरहाल, यह एक सच्चाई यह भी है कि 2016-17 का साल मॉनसून के लिहाज से सामान्य साबित हुआ है, पीछे के दो साल सूखे के साल रहे, इसलिए तीन सालों का औसत निकाल कर चार फीसदी की वृद्धि दर दिखाने की चतुराई से कहीं बेहतर होता, अगर 2016-17 के कृषि-उत्पादन की तुलना 2013-14 में हुई उपज या बुवाई के रकबे से की जाती. आंकड़ा तब घटा हुआ नजर आता. कुछ ऐसा ही मामला यूनिवर्सल बेसिक इनकम का है.
जरूरी नहीं है कि बजट में सबको एक बुनियादी आमदनी प्रदान करने के फैसले की घोषणा हो ही जाये, लेकिन आलोचक आशंका जता रहे हैं कि इस बहाने सेहत, शिक्षा, आवास आदि पर जारी सब्सिडी हटाने की कोशिश हो सकती है. आर्थिक समीक्षा मुख्य आर्थिक सलाहकार तैयार करते हैं. जरूरी नहीं कि बजट इसके अनुरूप हो, तो भी संकेत यही हैं कि बजट में नोटबंदी के असर को नकारने के उपायों पर जोर होगा.
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