धर्म और जाति पर न हो वोट

Updated at : 05 Jan 2017 6:45 AM (IST)
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धर्म और जाति पर न हो वोट

विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार ‘अभी रुग्ण है तेरे-मेरे जीने का विश्वास रे’, इस पंक्ति में कवि ने जीने के विश्वास को परिभाषित करते हुए उन जनतांत्रिक मूल्यों-सिद्धांतों का हवाला दिया था, जिनके आधार पर हमने स्वतंत्रता पाने के बाद एक पंथ-निरपेक्ष, समतावादी राष्ट्र-समाज के निर्माण का संकल्प लिया था. यह त्रासदी ही है कि वैसा […]

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विश्वनाथ सचदेव

वरिष्ठ पत्रकार

‘अभी रुग्ण है तेरे-मेरे जीने का विश्वास रे’, इस पंक्ति में कवि ने जीने के विश्वास को परिभाषित करते हुए उन जनतांत्रिक मूल्यों-सिद्धांतों का हवाला दिया था, जिनके आधार पर हमने स्वतंत्रता पाने के बाद एक पंथ-निरपेक्ष, समतावादी राष्ट्र-समाज के निर्माण का संकल्प लिया था. यह त्रासदी ही है कि वैसा समाज, वैसी व्यवस्था आज भी एक सपना ही है. आज भी हमारा देश धर्मों, जातियों, वर्गों में बंटा हुआ है. आज भी समूची राजनीति धर्म और जाति की बैसाखियों के सहारे चल रही है. न नेताओं को धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगते हुए शर्म आती है, और न ही मतदाता यह समझने की कोशिश करता है कि धर्म और जाति के नाम पर उसे बरगलाया जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को आगाह किया है कि धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगना हमारे संविधान के विरुद्ध तो है ही, एक गंभीर अपराध भी है. यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अब वोट देनेवाला भी धर्म के आधार पर यदि अपना निर्णय घोषित करता है, तो वह भी संविधान के उल्लंघन का दोषी होगा. जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) के अनुसार, हमारे यहां धर्म या जाति के नाम पर वोट मांगना अपराध है और ऐसा करनेवाले का चुनाव रद्द किया जा सकता है. इसी आधार पर वोट देनेवाले को भी दोषी बताया गया है. 25 साल पहले महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में चुनाव जीतनेवाले भाजपा के दो उम्मीदवारों पर चुनाव में धर्म के दुरुपयोग का आरोप लगा था.

वस्तुतः धर्म और जाति का चुनावी लाभ के लिए आपराधिक उपयोग किसी एक दल तक सीमित नहीं है. यह सिर्फ वोट की राजनीति नहीं है. यह संविधान की भावना में आस्था और विश्वास का भी सवाल है. यह एक शर्मनाक सचाई है कि पिछले साठ-सत्तर सालों में हमारे जीने का विश्वास, अर्थात् घोषित मूल्यों-आदर्शों में हमारा विश्वास, बीमार ही साबित हुआ है.

हालांकि, सभी राजनीतिक दल इनकार करते हैं कि वे अपनी राजनीति के रथ को धर्म और जाति के पहियों पर चलाते हैं, पर यह भी एक शर्मनाक सच्चाई है कि हमारी समूची राजनीति धर्म और जाति के आधार पर ही चल रही है. यह जरूरी नहीं है कि चुनावों में धर्म या जाति की दुहाई देकर वोट मांगा जाये, तभी उसे गलत कहा जाये. गलत वह तब भी होता है, जब मतदाताओं के धर्म और जाति के आधार पर उम्मीदवार खड़े किये जाते हैं. जाति के आधार पर उम्मीदवारों का चयन क्यों होता है? वोटे बैंकों की अवधारणा क्यों आ गयी? धर्म-गुरुओं की शरण में क्यों जाते हैं राजनेता? यह विश्वास क्यों पनपा कि जाटों के वोट जाट उम्मीदवार को ही मिलेंगे या फिर दलितों की पार्टी होने का दावा करनेवाला दल ही दलितों का हितैषी हो सकता है? ये सारे सवाल हमारी समूची राजनीति के कलुष को ही उजागर करते हैं. चुनाव-दर-चुनाव हम इस कलुष को ढोते चले आये हैं. धर्मों और जातियों में बांट रखा है हमने अपने आपको और हमारे राजनीतिक दल इस बंटवारे का राजनीतिक लाभ उठाने में तनिक भी संकोच नहीं करते. कुछ दल तो ऐसे हैं, जो धर्म के आधार पर इस देश पर अपना विशेषाधिकार समझते हैं.

देश का दुर्भाग्यपूर्ण बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था, लेकिन हमारे संविधान-निर्माताओं ने इस आधार को भावी भारत के निर्माण का आधार नहीं माना. इसीलिए उन्होंने पंथ-निरपेक्ष, जनतांत्रिक संविधान बनाया. धर्म या जाति या वर्ग-वर्ण आदि के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा समझना संविधान का अपमान करना है. लेकिन, बड़े-बड़े राजनेता खुलेआम धर्म के नाम पर वोट मांगते हैं. यही वजह है कि कभी राम मंदिर हमारे यहां चुनावी मुद्दा बन जाता है, कभी किसी को पाकिस्तान भेजने की बात होने लगती है, तो कभी धर्म के नाम पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की बात होती है.

धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के नाम पर वोट मांगने को अपराध घोषित करके सुप्रीम कोर्ट ने इस देश के लोकतांत्रिक विश्वास को स्वस्थ बनाये रखने की दिशा में एक निर्णायक कदम उठाया है. पर, इसकी सफलता तो इस बात पर निर्भर करती है कि राजनेता, पार्टियां और जन-मानस कितनी ईमानदारी से इसको अपना विश्वास बनाते हैं. अब तक तो राजनीति के ठेकेदारों ने बचाव के रास्ते ही खोजते रहे हैं. ‘हिंदुत्व’ के मामले को ही लें. साल 1995 में न्यायालय द्वारा हिंदुत्व को एक जीवन-पद्धति बतानेवाला निर्णय भाजपा जैसे दलों को रास आ गया. पता नहीं क्यों सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार करना जरूरी नहीं समझा. राजनीतिक दल इस जीवन-पद्धति को जिस तरह अपने चुनावी स्वार्थों के लिए काम में लेते हैं, यह किसी से छिपी बात नहीं है.

बहरहाल, पांच राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं. जल्दी ही सामने आ जायेगा कि धर्म को राजनीति से अलग करने की सुप्रीम कोर्ट की इसी स्वागत-योग्य कोशिश को राजनीतिक दल कितना सफल होने देते हैं. संविधानिक व्यवस्था अथवा कानूनी धाराओं से इतर, यह बात कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि देश का मतदाता हमारे संविधान के मूल्यों-विश्वासों के अनुरूप कैसे और कितना आचरण करता है. मतदाता को ही संकल्प लेना है कि ऐसे राजनेताओं को समर्थन नहीं देना है, जो धर्म-जाति के नाम पर समाज को बांटें.

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