कर्जदारों पर सख्ती
Updated at : 05 Jan 2017 6:44 AM (IST)
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सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद अब केंद्र सरकार या रिजर्व बैंक के पास बड़े कर्जदारों के नाम छुपाने का कोई बहाना नहीं रह गया है. नियमों की ओट लेकर रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार ने बार-बार अदालत को कहा है कि कर्ज चुकाने में आनाकानी कर रहे बड़े कॉरपोरेट घरानों या व्यक्तियों के नाम […]
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सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद अब केंद्र सरकार या रिजर्व बैंक के पास बड़े कर्जदारों के नाम छुपाने का कोई बहाना नहीं रह गया है. नियमों की ओट लेकर रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार ने बार-बार अदालत को कहा है कि कर्ज चुकाने में आनाकानी कर रहे बड़े कॉरपोरेट घरानों या व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक करने से ‘आर्थिक हित, व्यावसायिक साख और लेन-देन के मामलों में कायम रखे जानेवाले आपसी विश्वास’ को धक्का पहुंचेगा.
बैंकों पर गैर-निष्पादक परिसंपत्तियों (एनपीए) के बढ़ते बोझ और इसे बड़े पैमाने पर बट्टाखाता में रखने की खबरों के बीच एक जनहित याचिका में व्यापक राष्ट्रीय हित में बड़े कर्जदारों के नाम जाहिर करने की मांग की गयी थी. पिछले साल अक्तूबर में न्यायालय ने इससे सहमति जताते हुए कहा था कि ऐसा करना लोकहित में है. इससे पहले कड़े अदालती तेवर को देखते हुए मार्च, 2016 में रिजर्व बैंक ने सीलबंद लिफाफे में 500 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम की कर्ज अदायगी न करनेवाले बड़े कर्जदारों के नाम सौंपे थे, पर यह विनती भी की थी कि उनके नाम सार्वजनिक न किये जायें. तर्क यह था कि अगर कर्जदार सचमुच वित्तीय संकट में होने के कारण कर्ज नहीं चुका पा रहा है और उसका नाम जाहिर हो जाता है, तो इससे उसके व्यावसायिक हितों को हानि पहुंच सकती है.
यह भी बार-बार कहा गया कि अगर कोई कंपनी साख के घाटे से असफल होती है, तो उसमें कार्यरत कर्मचारी बेरोजगार होंगे और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा. लेकिन, अब अदालत के सामने यह बात साफ हो चुकी है कि हमारा तंत्र गंभीर संकट में है और उसे उबारने के लिए की जा रही सरकारी पहलों को खास कामयाबी नहीं मिल पा रही है. बैंकों के डूबे कर्ज की वापसी के लिए बने ट्रिब्यूनल के सामने अभी 70 हजार मामले लंबित हैं और ट्रिब्यूनल को पांच लाख करोड़ की वसूली करानी है. एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में एनपीए का बोझ सबसे ज्यादा भारतीय बैंकों पर है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन है कि भारतीय बैंकों के कुल कर्जे में छह फीसदी फंसे हुए कर्जे हैं, जबकि चीन में यह महज 1.5 फीसदी तथा दक्षिण कोरिया में 0.6 फीसदी ही है. बीते जून में बैंकों का एनपीए 121 अरब डॉलर से बढ़ कर 138 अरब डॉलर का हो चुका था. महज छह माह के भीतर एनपीए में 15 फीसदी का इजाफा हुआ है. सबसे ज्यादा एनपीए सरकारी बैंकों का है और वे ही काॅरपोरेट घरानों को ऐसे कर्जे देने में सबसे आगे हैं. बड़े कर्जदारों के नाम जाहिर होने से उन पर कर्ज चुकाने का दबाव बढ़ेगा, और यह भी जाहिर होगा कि सरकारी बैंक किन घरानों पर ज्यादा मेहरबान हैं.
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