अस्तित्व का सवाल

सीएनटी-एसपीटी एक्ट लंबे संघर्ष के बाद बना एक कानून है. इसके लिए हजारों आदिवासियों ने कुर्बानी दी है. यह एक्ट आदिवासियों का रक्षा कवच है. इसी कवच के कारण अभी तक आदिवासियों का अस्तित्व बचा हुआ है. यह एक्ट जमींदारों, महाजनों, पूंजीपतियों और भू-माफियाओं से आदिवासियों की जमीन बचाने के लिए बनाया गया था. अब […]
सीएनटी-एसपीटी एक्ट लंबे संघर्ष के बाद बना एक कानून है. इसके लिए हजारों आदिवासियों ने कुर्बानी दी है. यह एक्ट आदिवासियों का रक्षा कवच है. इसी कवच के कारण अभी तक आदिवासियों का अस्तित्व बचा हुआ है. यह एक्ट जमींदारों, महाजनों, पूंजीपतियों और भू-माफियाओं से आदिवासियों की जमीन बचाने के लिए बनाया गया था.
अब झारखंड सरकार इस एक्ट में संशोधन कर आदिवासियों की जमीन को पुनः पूंजीपतियों के हवाले करना चाहती है. राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी सहित पूर्व मुख्यमंत्रियों अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन ने भी संशोधन का विरोध किया है. भगवान बिरसा के प्रपौत्र ने भी संशोधन का विरोध किया और राज्यपाल से मिल कर इसे वापस लेने की मांग की. इससे साफ पता चलता है कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन किसी भी तरह से आदिवासियों और राज्य हित में नहीं है.
देवेंद्र सोरेन, पेटरवार, बोकारो
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