नये अमेरिका का प्रभाव

Updated at : 03 Jan 2017 6:39 AM (IST)
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नये अमेरिका का प्रभाव

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री अभी तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था ‘खुली’ थी. अमेरिका के केंद्रीय बैंक ‘फेड’ ने ब्याज दरें शून्यप्राय बना रखी थी. अमेरिकी कंपनियों के लिए अमेरिका में ऋण लेकर भारत जैसे देशों में निवेश करना लाभप्रद था, चूंकि ऋण पर उन्हें लगभग शून्य ब्याज देना होता था. अमेरिकी सरकार विदेशों से स्किल्ड लेबर […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला

अर्थशास्त्री

अभी तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था ‘खुली’ थी. अमेरिका के केंद्रीय बैंक ‘फेड’ ने ब्याज दरें शून्यप्राय बना रखी थी. अमेरिकी कंपनियों के लिए अमेरिका में ऋण लेकर भारत जैसे देशों में निवेश करना लाभप्रद था, चूंकि ऋण पर उन्हें लगभग शून्य ब्याज देना होता था. अमेरिकी सरकार विदेशों से स्किल्ड लेबर को अपने देश में आमंत्रित कर रही थी.

ये कर्मी एच1बी वीजा पर अमेरिका जाकर काम करते थे. अमेरिकी सरकार की सोच थी कि इन कर्मियों के प्रवेश से अमेरिकी कंपनियां अधिक लाभ कमा सकेंगी. इनसे अधिक मात्रा में टैक्स वसूला जा सकेगा. इसी के बल पर राष्ट्रपति ओबामा ने सरकारी स्वास्थ सेवाओं का भारी विस्तार किया, जिसे ‘ओबामा केयर’ के नाम से जाना जाता है. रणनीति थी कि सरहद को खुला रखो और ब्याज दरों को न्यून रखो, ताकि अमेरिकी कंपनियां पूरे विश्व में भ्रमण करके लाभ कमायें.

इस रणनीति के कुछ लाभ भी दिख रहे हैं. अमेरिका में बेरोजगारी दर 4.6 प्रतिशत के एक दशक के न्यूनतम स्तर पर आ गयी है. लेकिन नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस रणनीति से संतुष्ट नहीं हैं.

दरअसल, एक ओर अमेरिकी कंपनियों द्वारा एच1बी वीजा पर सस्ते भारतीय कर्मियों को रोजगार दिया जा रहा है, दूसरी ओर अमेरिकी नागरिक बेरोजगार हो रहे हैं. अतः ट्रंप ने कहा है कि एच1बी वीजा पर सख्ती की जायेगी. अमेरिकी कंपनियों को अमेरिका में ही रोजगार उत्पन्न करने को प्रोत्साहित किया जायेगा. अमेरिका वैश्वीकरण से पीछे हट रहा है. अमेरिका का ध्यान अब अपने देश पर ज्यादा और विश्व पर कम होगा.

इससे भारत पर दो प्रकार से विपरीत प्रभाव पड़ेगा. अमेरिकी कंपनियों ने भारत में काॅल सेंटर, रिसर्च सेंटर आदि स्थापित कर रखे हैं. वे इसे भारत में बंद करके वापस अमेरिका ले जायेंगे. एच1बी वीजा पर भारतीय कर्मियों के लिए काम करना कठिन हो जायेगा. ट्रंप द्वारा आयात कर में वृद्धि की जाने की संभावना है, जिससे भारतीय उद्यमों को निर्यात करने में कठिनाई आयेगी. ट्रंप के आने से हमें विदेशी निवेश कम मिलेगा, हमारे कर्मी कम संख्या में अमेरिका जायेंगे और हमारे निर्यात दबाव में आयेंगे.

‘फेड’ ने हमारे लिए परिस्थिति को और भी प्रतिकूल बना दिया है. दिसंबर में फेड द्वारा ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि की गयी. साथ ही कहा गया है कि वर्ष 2017 में ब्याज दरों को तीन बार बढ़ाये जाने की संभावना है. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़नें से निवेशकों की प्रवृत्ति अपनी पूंजी को भारत जैसे विकासशील देशों से निकाल कर वापस अमेरिका ले जाने की बनेगी.

वर्तमान में अमेरिका में ब्याज दरें 1 प्रतिशत से कम हैं, इसलिए निवेशक अमेरिका में ऋण लेकर भारत सरकार द्वारा जारी बांड में निवेश कर रहे हैं, चूंकि भारत में ब्याज दरें ऊंची हैं. अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने से इनके लिए अमेरिका में ही निवेश करना लाभप्रद होगा. इनके द्वारा भारत से पूंजी निकाल कर अमेरिका ले जाया जायेगा. बीते दिसंबर में हमारे शेयर बाजार के टूटने का यही कारण रहा. वर्ष 2017 में यदि फेड द्वारा तीन बार ब्याज दरों में वृद्धि की गयी, तो भारत से भारी मात्रा में पूंजी का पलायन होगा. वहीं ट्रंप के कारण भारत से विदेशी निवेश वापस जायेगा, चूंकि अमेरिकी सरकार उन्हें वापस आने को प्रोत्साहित करेगी.

इस परिस्थिति में हमें अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए. 1991 में लागू किये गये आर्थिक सुधारों के बाद हमारी रणनीति थी कि हम विदेशों से पूंजी को आकर्षित करेंगे. विदेशी निवेशक भारत में फैक्ट्रियां लगायेंगे. वर्तमान एनडीए सरकार इसी नीति पर चल रही है. प्रयास है कि मेक इन इंडिया के अंतर्गत बड़ी विदेशी कंपनियों को भारत में फैक्ट्रियां लगाने को निमंत्रित किया जाये. ट्रंप तथा फेड की ऊपर बतायी गयी नीतियों से परिस्थिति बदतर होगी. अतः हमें विदेशी निवेश के पीछे भागने के बजाय अपनी पूंजी को देश में ही निवेश पर ध्यान देना चाहिए.

नोटबंदी के समय में उद्यमियों एवं व्यापारियों को चोर के रूप में सरकार के द्वारा दर्शाया गया है.

ऐसा करने से उद्यमियों का झुकाव देश के बाहर निवेश करने का बनेगा. ऐसे में हमें विदेशी पूंजी नहीं मिलेगी, चूंकि वह अमेरिका को वापस जायेगी और घरेलू पूंजी भी नहीं मिलेगी, चूंकि वह यहां भयाक्रांत महसूस करेगी. अतः देश के व्यापारियों में विश्वास बनाना जरूरी है. देश में वातावरण बन रहा है कि सरकारी कर्मी ईमानदार हैं और इनके द्वारा भ्रष्ट व्यापारियों को पकड़ा जा रहा है. पर, सच्चाई यह है कि सरकारी कर्मियों की मदद से ही व्यापारी काले धंधे में लिप्त होते हैं. सरकारी कर्मी का काम है कि वह काले धंधे को राेके.

इनके द्वारा अपने दायित्व का निर्वाह न करने का दोष व्यापारी पर नहीं मढ़ना चाहिए. सरकारी कर्मियों द्वारा कराये गये काले धंधे का दोष व्यापारी को नहीं देना चाहिए. देश में व्यापार के वातावरण को तत्काल सुधारने की जरूरत है. इसी क्रम में हमें निर्यातों को बढ़ाने के प्रयास छोड़ कर आयात कर को बढ़ाना चाहिए और अधिकाधिक माल का घरेलू उत्पादन करना चाहिए, अन्यथा हम संकट में पड़ेंगे.

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