राह भूले थे कहां से हम?

Updated at : 02 Jan 2017 5:45 AM (IST)
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राह भूले थे कहां से हम?

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार वर्षारंभ में उन राहों को याद करना आवश्यक है, जिन पर हम सब जाने-अनजाने चलते रहे हैं. क्या वे राहें सही थीं या हम सही मार्गों को भूल गये थे? अब नये वर्ष में सोचना-समझना जरूरी है. अगर गलत थी तो- राह भूले थे कहां से हम? प्रत्येक पाठ का अपना एक […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

वर्षारंभ में उन राहों को याद करना आवश्यक है, जिन पर हम सब जाने-अनजाने चलते रहे हैं. क्या वे राहें सही थीं या हम सही मार्गों को भूल गये थे? अब नये वर्ष में सोचना-समझना जरूरी है. अगर गलत थी तो- राह भूले थे कहां से हम? प्रत्येक पाठ का अपना एक संदर्भ होता है और कभी-कभी कोई पाठ इतना व्यापक, समग्र और बहुआयामी होता है कि हम अलग से उसका संदर्भ निर्मित कर सकते हैं.

गालिब और शेक्सपीयर के संबंध में अक्सर कहा जाता है कि उनकी कोई-काई पंक्ति अपने संदर्भ से छिटक कर किसी भी संदर्भ में अर्थवान हो उठती है तमाम सीमाओं को पार करती हुई. पाठ का संदर्भ और संदर्भ के पाठ पर हम अधिक विचार नहीं करते. ऐसे में किसी पंक्ति को उसके संदर्भ से अलग कर, नये संदर्भों में फिट करना बहुतों को प्रतिक्रिया न लगे, पर गीत और कविता की कोई पंक्ति कभी-कभी अपने संदर्भ से अलग होकर नये संदर्भों का या तो निर्माण करती है या भिन्न संदर्भों से जुड़ कर और अधिक अर्थवान हो उठती है.

शैलेंद्र के गीतों के जादू से हम सभी सुपरिचित हैं. उनके द्वारा रचित और मन्ना डे द्वारा गाया ‘सीमा’ फिल्म (1955) के ‘तू प्यार का सागर है’ गीत की पंक्तियां हमें नये सिरे से सोचने को भी आमंत्रित करती हैं. इस गीत में एक ओर झूमती जिंदगी है और दूसरी ओर मौत है- ‘इधर झूमती जाये जिंदगी’/ उधर है मौत खड़ी’. वर्षारंभ सबके लिए आनंददायी नहीं होता. प्राय: प्रत्येक दिन कहीं जिंदगी गाती और नाचती है, तो कहीं मौत खड़ी होती है.

हम सब वर्ष का नया दिन धूम-धाम से मनाते हैं और फिर जीवन उसी पुराने रूटीनी ढंग से जिया जाता है. सबके जीवन की राह अलग होती है. राहों का चयन कठिन होता है. कभी जिंदगी एक ही राह पर चलती है और कभी दूसरी राहों पर. हम कभी-कभी राह भटकते हैं, भूलते हैं और अब इस समय में समझानेवाले लोग सबको नहीं मिलते हैं. पचास के दशक में प्यार में यह कहा जा सकता था- ‘अब तू ही इसे समझा, राह भूले थे कहां से हम?’ जाड़े के दिनों में सूर्य गर्माहट देता है, पर संबंधों में अब पहले जैसी गर्माहट कम है. जहां तक राह भूलने का सवाल है, बहुत कम लोग यह मानेंगे कि वे राह भूल चुके हैं. क्या हम सबकी राह सही है? अगर सबकी राह सही होती, तो हम सब मंजिल पर पहुंचे होते, अब तक अवश्य.

सही राह की पहचान सबको नहीं होती. यह भ्रम का समय है और हम सभी अंशों में भ्रमित हैं, भ्रम का जीवन जीते हैं. इक्कीसवीं सदी का भारत क्या सही मार्ग पर आगे बढ़ रहा है? क्या हमारे देश के राजनीतिक दल राह नहीं भूल गये हैं? क्या शिक्षकों ने जाे राह चुनी है, वह सही है? क्या नरेंद्र मोदी जिस मार्ग पर भारत को दौड़ाने में लगे हैं, वह सही मार्ग है? राजनीति, अर्थनीति जिस मार्ग पर चल रही है, क्या वह सही है? हमारे समय में राह भूलने को स्वीकार करनेवाले कम मिलेंगे. सब दूसरों की आलोचना करते हैं. अपने भीतर कोई नहीं देखता. आत्मालोचन बहुत कम लोग करते हैं.

वास्तविकता यह है कि भारत अपनी राह भूल चुका है. अब वह ‘भा’ (प्रकाश) में ‘रत’ नहीं है. राह भूलना सामान्य घटना नहीं है. राह भूल कर हम सही मंजिल और मुकाम तक शीघ्र नहीं पहुंच सकते. जीवन में टेढ़ी-मेढ़ी राहों पर चला जा सकता है, पर राह भूलना चूक जाना है.

गांधी ने जो राह बनायी, नेहरू उस पर नहीं चले. नेहरू ने जो राह बनायी, उनकी बेटी इंदिरा गांधी उस पर नहीं चलीं. अब नरेंद्र मोदी ने जो राह बनायी है, उस राह पर सब क्यों चलें? कविता में निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन ने जो राह बनयी, वह आज के कई कवियों को पुरानी लग सकती है. नामवर सिंह भी कम ही गुनगुनाते हैं, हम स्वीकारते हैं कि हमने सही मार्ग का चयन नहीं किया. राह भूलने का एहसास तुरंत नहीं होता. समय जब बह जाता है, हम स्वीकारते हैं कि हमने सही मार्ग का चयन नहीं किया. जीवन में राह भूलना एक प्रकार से जीवन गंवा देना है. भारत में आज भी अशिक्षा है, कुपोषण है, गरीबी है, भूखमरी है, बेरोजगारी है. क्या हमने सचमुच स्वतंत्र भारत की एक सही राह बनायी या किसी नकल में सही राह भूल गये?

क्या हम वर्षारंभ में उन प्रश्नों से टकरायेंगे, जिन्हें हल करने के लिए अभी पूरा वर्ष सामने है? अब प्यार से बताने-समझानेवाले कम हो रहे हैं. मनुष्य एक मुकम्मल इंसान बनने से दूर हो रहा है. देखते-देखते वर्ष, दशक- सब बीत जाते हैं. प्रत्येक क्षण आगे बढ़ जाता है. राह भूल कर हम मंजिल तक नहीं पहुंच सकते. नयी राहों का निर्माण सबके वश की बात नहीं. हिंदी सिनेमा के गीतों का अब तक कोई व्यापक समाजशास्त्रीय अध्ययन नहीं हुआ है.

ऐसा अध्ययन आंखें खोलनेवाला होगा. शंकर, शैलेंद्र, साहिर या अन्य के गीत हमारे भीतर बजते हैं. जरूरत उन्हें बाहर लाकर यह बताने की है कि इनमें किस प्रकार समय धड़कता है. हम बहुत कुछ भूलते जा रहे हैं. राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के सेनानियों को याद नहीं करो. ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़नेवाला भारत अमेरिकी साम्राज्यवाद से बेखबर है. ‘अब तू ही इसे समझा, राह भूले थे कहां से हम?’

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