जाते बरस पर नजर

Updated at : 30 Dec 2016 5:50 AM (IST)
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जाते बरस पर नजर

‘अपनी यादों को सहेज कर रखो’ / कहा था मेरे दोस्त माइक ने / ‘क्योंकि तुम उन्हें दोबारा नहीं जी सकोगे’… एक दिन बाकी है 2016 की विदाई में. पूरे बरस का लेखा-जोखा करते हुए इस साल साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बॉब डिलन की ये पंक्तियां याद आती हैं. इसी के साथ यह […]

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‘अपनी यादों को सहेज कर रखो’ / कहा था मेरे दोस्त माइक ने / ‘क्योंकि तुम उन्हें दोबारा नहीं जी सकोगे’… एक दिन बाकी है 2016 की विदाई में. पूरे बरस का लेखा-जोखा करते हुए इस साल साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बॉब डिलन की ये पंक्तियां याद आती हैं.
इसी के साथ यह भी याद किया जाना चाहिए कि बीते हुए की नींव पर ही नये साल की उम्मीदों को आकार मिलेगा. आशा-निराशा, सुख-दुख, राहत-नुकसान जैसे सभी पलड़ों पर 2016 कुछ-न-कुछ रख गया है- कहीं ज्यादा, कहीं कम.
साल 2016 के दूसरे ही दिन पठानकोट सैन्य ठिकाने पर आतंकी हमले से शुरू हुआ सिलसिला जारी है. पाकिस्तान की शह और समर्थन से होनेवाली घुसपैठ के खतरे भी बढ़े हैं. कश्मीर घाटी में महीनों से व्याप्त बेचैनी थमी नहीं है. दूरदर्शिता के अभाव और चूक से भी हालात खराब हुए, पर भारत की कूटनीतिक कोशिशें पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में काफी हद तक कामयाब रही हैं.
देश के भीतर राजनीतिक घमासान का एक नकारात्मक नतीजा यह हुआ कि शीतकालीन सत्र पूरी तरह से हंगामे की भेंट चढ़ गया तथा पिछले दो सत्रों में भी अक्सर कार्यवाही रुकती रही. आठ नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पांच सौ और हजार के पुराने नोट बंद करने के फैसले से हुई नकदी के संकट के कारण देशवासियों को घंटों बैंकों और एटीएम के सामने कतारों में बिताना पड़ा. आज इस फैसले के 50 दिन पूरे हो रहे हैं, पर इसके अच्छे-बुरे नतीजों के बारे में कुछ समय बाद ही कहा जा सकेगा. हालांकि, इतना तय है कि कारोबार पर इसका बड़ा असर हुआ है और अर्थव्यवस्था की गति को बनाये रखने के लिए जरूरी है कि नुकसान की भरपाई जल्दी कर ली जाये.
राष्ट्रवाद, दलित उत्पीड़न और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सड़क से संसद तक बड़ी तल्ख बहसें हुईं. बेहाल से लगते 2016 में खिलाड़ियों की बदौलत हमें खुश होने के अवसर भी मिले. ओलिंपिक मेडलों के मामले में भारतीय दस्ता उम्मीदों पर खरा तो नहीं उतर सका, पर पीवी सिंधु, साक्षी मलिक और दीपा कर्माकर की बुलंदियां बरसों तक याद की जायेंगी. क्रिकेट और हॉकी की टीमों ने भी शानदार उपलब्धियां हासिल कीं. इसरो के सैटेलाइट भी सुदूर अंतरिक्ष की सैर पर जाते रहे. लेकिन, देश की धरती, हवा और पानी प्रदूषण की चपेट में रहे और देश के विभिन्न शहरों की आबादी खतरनाक पर्यावरण में रहने के लिए अभिशप्त रही.
वन्य जीवों के संरक्षण में भी असफलताएं हाथ लगीं. साल 2016 में कम-से-कम 129 बाघ व 419 चीतों की मौत हुई, जबकि 2015 में 91 बाघों और 397 चीतों की मौत हुई थी. बीते दस सालों के हिसाब के मुताबिक, कम-से-कम 50 बाघ तथा 127 चीते शिकारियों का निशाना बने. जानकारों की मानें, तो वास्तविक आंकड़े कहीं अधिक हैं और बड़ी संख्या में अन्य संरक्षित जीव-जंतु भी मारे गये हैं. साल के पहले तीन महीनों में जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण 1,800 से अधिक लुप्तप्राय जलीय और समुद्री जीवों की मौत हुई. संतोष की बात है कि राष्ट्रीय पशु बाघ की आबादी बढ़ी है और इनकी संख्या 2,500 तक हो सकती है.
बहरहाल, कुछ ऐसे भी कारनामें हुए हैं, जिन्होंने भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है. तमिलनाडु के कामुथी में दुनिया का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा संयंत्र, उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक दिन में पांच करोड़ से अधिक वृक्षारोपण, बिना रुके एयर इंडिया की अब तक की सबसे लंबी उड़ान, मुंबई में समुद्री तट की सफाई जैसी घटनाएं आनेवाले कल की बेहतरी का भरोसा बढ़ा देती हैं. विभिन्न दुर्घटनाओं में मौतों का सिलसिला इस साल भी जारी रहा, पर मोबाइल फोन से सेल्फी लेने के जुनून में होनेवाली मौतों के मामले में भारत 2015 की तरह इस साल भी आगे रहा.
देश से बाहर नजर दौड़ायें, तो यह साल बेहद निराशा का दौर रहा. मध्य-पूर्व और अफ्रीका के संकटों से तबाह लाखों शरणार्थियों को दर-ब-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं और दुनिया उनकी समुचित मदद नहीं कर पा रही है.
शायद करना भी नहीं चाहती है. सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भटकते 7,200 लोग सीमाओं पर मारे गये हैं, जिनमें पांच हजार से अधिक मौतें अकेले भू-मध्य सागर में हुई हैं. आर्थिक संकट के लंबे दौर ने पश्चिमी देशों की राजनीति में भूचाल ला दिया है. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत, ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से निकलने का फैसला, फ्रांस, इटली, हॉलैंड, ऑस्ट्रिया समेत कई देशों में उग्र राष्ट्रवाद का उभार जैसी घटनाएं धुर-दक्षिणपंथ की धमक का साफ संकेत हैं. इन प्रवृत्तियों के असर से विश्व राजनीति अछूती नहीं रह सकती है.
यह भी उल्लेखनीय है कि एक तरफ नफरत और नस्लवाद को हवा देनेवाले बड़बोले गरीबों की तकलीफ का हवाला देकर सत्ता की तरफ बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ दुनिया के सबसे धनी लोगों की संपत्ति में 2016 में 330 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है.
आर्थिक विषमता, पर्यावरण संकट तथा युद्धों से लहूलुहान दुनिया और धनकुबेरों की कमाई का रिश्ता भी इस साल कुछ साफ हुआ है. खैर, साल तो गुजर गया, पर जो कुछ सीखा गया और दे गया, उसे सहेजने और समझने की जरूरत है, ताकि 2017 को हम बेहतर बना सकें.
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