विद्या का मंदिर छोड़ चौराहे पर मां

Published at :11 Feb 2014 6:18 AM (IST)
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विद्या का मंदिर छोड़ चौराहे पर मां

।। दीपक मिश्र ।। प्रभात खबर, भागलपुर मां-बाप की गोद को बच्चों को पहली पाठशाला माना जाता है. वे बच्चों को सिर्फ संस्कारित और शिक्षित नहीं करते, बल्कि जीवन के यथार्थ से भी परिचित कराते हैं. लेकिन अब जमाना बदल गया है. अब मां- बाप की बातें नयी पीढ़ी को बेमतलब लगती हैं. उनकी हर […]

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।। दीपक मिश्र ।।

प्रभात खबर, भागलपुर

मां-बाप की गोद को बच्चों को पहली पाठशाला माना जाता है. वे बच्चों को सिर्फ संस्कारित और शिक्षित नहीं करते, बल्कि जीवन के यथार्थ से भी परिचित कराते हैं. लेकिन अब जमाना बदल गया है. अब मां- बाप की बातें नयी पीढ़ी को बेमतलब लगती हैं. उनकी हर बात फालतू लगती है. लेकिन, उन्हें मां-बाप की बात तब समझ में आती है जब उनके अपने बच्चों को उनकी बात बेमतलब लगने लगती है.

इस कठोर सच्चई के जरिए बात मैं सरस्वती पूजा की करता हूं. आज से दो-तीन दशक पहले तक सरस्वती पूजा स्कूल और कॉलेज तक या फिर घर तक सीमित थी. कहीं-कहीं सार्वजनिक जगहों पर मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित होती थी. लाउडस्पीकर नहीं के बराबर बजता था. गाने के लिए रेडियो का इस्तेमाल होता था. अब स्थिति ठीक उलट है. स्कूल-कॉलेज से हट कर सरस्वती की प्रतिमा अब चौक-चौराहों पर अधिक बैठायी जाने लगी है. पूजा और प्रतिमा से अधिक बजट डीजे और विसर्जन जुलूस का होता है. डीजेवालों को खास हिदायत दी जाती है कि फलां फिल्म का आइटम सांग जरूर बजाना चाहिए.

विसर्जन की शोभायात्रा में सरस्वती मां से सबंधित नारे ‘चार चवन्नी चांदी की जै सरस्वती महरानी की’, ‘सरस्वती माता, विद्या दाता’, ‘गोविंद बोल भाए राधे-राधे, हरगोविंदे जै, परमा नंदे’.. आदि तो लगभग गायब ही हो चुके हैं. बस चवन्नी छाप गाने ही विसर्जन की शोभायात्रा में बजते हैं. उस जमाने में आज की तरह घटिया गाने भी लिखे नहीं जाते थे. पहले सरस्वती पूजा वाकई पूजा थी, अब कम ही लोग इसे पूजा की तरह मनाते हैं. अधिकतर लोगों के लिए सरस्वती पूजा अब मनोरंजन का पर्व हो गया है. हालांकि उस जमाने में सरस्वती पूजा के बहाने आज की तरह वेलेनटाइन डे तो मन ही जाता था, लेकिन उसमें भी गरिमा रहती थी. बस आंखों की भाषा से दिल की बात बता दी जाती थी. अब गरिमा व मर्यादा कहां, सब कुछ खुल्लमखुल्ला.

विसर्जन में जितनी फूहड़ता हो सकती है, होती है. सरस्वती मां के आधुनिक मित्रों ने अब ठान लिया है कि मां तुम भले ही हमें जीवन का पहला पाठ पढाती हो, हमारी पाठशाला हो, लेकिन हम तुम्हें ‘अपडेट’ करेंगे. आधुनिक जीवन का पाठ पढ़ायेंगे. क्योंकि अब तुम्हारी पूजा में वीणा, सारंगी, हारमोनियम नहीं, डीजे बजता है. या तो तुम बदलो, या हम तुम्हें बदलना सिखायेंगे. पर मां का दर्द इस आधुनिक बेटे को कैसे समझ में आये? ऐसे में कवि की यह पंक्ति याद आती है :

विसर्जन के नाम पर वो मेरे दिल को दुख पहुंचाते हैं

अश्लील गानों पर नाच कर मां-बहनों को लजाते हैं

इसलिए ‘कौशल’ आपको राज की बात बताते हैं

इसलिए तो सारे देवी-देवता आज के तथाकथित भक्तों को

जीवनभर चौराहे पर नचाते हैं.

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