अब अमीरों के हैं सब पर्व-त्योहार

Updated at : 24 Oct 2016 5:31 AM (IST)
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अब अमीरों के हैं सब पर्व-त्योहार

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार सभी भारतीय पर्व-त्योहार कृषि से जुड़े हैं और अब महत्व ‘उद्योग’ का है, ‘कृषि’ का नहीं. भारत एक-दूसरे भारत (इंडिया) में रूपांतरित हो रहा है. ग्रामीण भारत और ‘डिजिटल इंडिया’ (आंकिक भारत) में फर्क है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भावी भारत (टुमॉरो इंडिया) को दो आइटी- ‘इंडियन टैलेंट’ (भारतीय प्रतिभा) और सूचना प्रौद्योगिकी […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

सभी भारतीय पर्व-त्योहार कृषि से जुड़े हैं और अब महत्व ‘उद्योग’ का है, ‘कृषि’ का नहीं. भारत एक-दूसरे भारत (इंडिया) में रूपांतरित हो रहा है. ग्रामीण भारत और ‘डिजिटल इंडिया’ (आंकिक भारत) में फर्क है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भावी भारत (टुमॉरो इंडिया) को दो आइटी- ‘इंडियन टैलेंट’ (भारतीय प्रतिभा) और सूचना प्रौद्योगिकी (इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी) से जोड़ते हैं. ये दो आइटी मिल कर एक तीसरा आइटी (इंडिया टुमॉरो) बनाते हैं. क्या यह संभव है, जैसा कि वे कहते हैं- ‘आत्मा गांव की हो और सुविधा शहर की’?

सवा अरब की आबादी वाले देश में नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के बाद पिछले 25 वर्ष में अरबपतियों और करोड़पतियों की संख्या कहीं अधिक बढ़ी है. फिलहाल देश में 95 अरबपति और 2.64 लाख करोड़पति हैं. न्यू वर्ल्ड हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के दस बड़े देशों में प्रॉपर्टी की सर्वाधिक वृद्धि भारत में हुई है. 376 लाख करोड़ रुपये की कुल संपत्ति के साथ भारत दुनिया के देशों में सातवें स्थान पर है. केवल तीन महीने (मई 2016 से अगस्त 2016) में यहां व्यक्तिगत संपत्ति में 26.82 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है.

इस साल का बजट 19.78 लाख करोड़ रुपये है. पिछले आठ साल में अरबपतियों की संख्या में 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिनकी कुल संपत्ति 100 लाख करोड़ रुपये है, जबकि भारत की जीडीपी 138 लाख करोड़ रुपये है. नाइट फ्रैंक ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2016 यह बताता है कि भारत में विगत दस वर्ष में अरबपतियों की संख्या वैश्विक औसत के मुकाबले चार गुना अधिक (330 प्रतिशत) बढ़ी है. देश की कुल संपत्ति 374.58 लाख करोड़ रुपये है, जिसका लगभग 40 प्रतिशत देश के मात्र पांच महानगरों- मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता में है. इन पांच महानगरों में 71 अरबपति हैं और 91-92 हजार करोड़पति हैं.

भूमंडलीकृत भारत चार्ल्स डिकेंस के ‘टेल ऑफ टू सिटीज’ की याद दिलाता है. यह एक साथ अच्छा और बुरा समय दोनों है. कुछ लोगों के लिए अच्छा और अधिसंख्य लोगों के लिए बुरा. यह धरती और धरती के संतानों- दोनों के लिए बुरा समय है. सामाजिक-आर्थिक असमानता कहीं अधिक बढ़ी है.

पर्व-त्योहार का स्वरूप बदल गया है. जिसके पास क्रय शक्ति है, उन्हीं का पर्व-त्योहार भी है. प्रत्येक पर्व-त्योहार का एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्न है, जो क्रमश: गौण होता गया है और धार्मिक पक्ष कहीं अधिक प्रमुख हुआ है. गणेश-लक्ष्मी की पूजा करनेवाले अब यह भूल जाते हैं कि गणेश की शारीरिक संरचना का एक विशेष अर्थ है. एक विशिष्ट और गंभीर अर्थ है. गणेश की चार भुजाएं चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक हैं, गणेश के उदर में समस्त चराचर सृष्टि विद्यमान है, गणेश के बड़े कान अधिक ग्राह्यशक्ति के प्रतीक हैं और उनकी छोटी आंखें सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं.

गणेश की लंबी नाक महाबुद्धि का प्रतीक है. वहीं लक्ष्मी धन, वैभव, सौभाग्य और समृद्धि की देवी हैं. गणेश और लक्ष्मी दोनों अमीरों के यहां वास कर रही हैं. पहले के जमाने में त्योहार से उपहार नहीं जुड़ा होता था और न ही त्योहारों में कोई लेन-देन ही चलता था. लेकिन, अब त्योहारों में प्रदर्शन है, आडंबर है, अलंकरण है, ‘इवेंट’ है. शायर नजीर अकबराबादी ने लिखा था- ‘हर इक मकां में जला फिर दीया दीवाली का’. यह एक शायर की ही इच्छा हो सकती है.

दीपावली का संबंध दीपों की पंक्ति से है. दीपावली का संबंध समूह और कतार से है. दीप का संबंध मिट्टी से है, श्रम से है, तेल और बाती से है. वर्तिका (बत्ती) तिल-तिल कर जलती है. ज्योतिशिखा का संबंध आत्माहुति से है. प्रकाश केवल अपने लिए नहीं, सबके लिए है, पूरे समाज के लिए है.

दीपावली एक ‘सेक्यूलर’ पर्व है. यह केवल हिंदुओं का पर्व नहीं है. इसका सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व है. दीपावली का प्रतीकात्मक अर्थ है. प्रतीकों को विरूपित-विकृत करनेवाले इसका अर्थ नहीं समझेंगे. वर्तिका ज्योतिर्मयी है और ज्योति सबके लिए है.

अंधकार तामसिक, आसुरी और मृत्युरूप है, अगति, अधोगति और जड़ता का प्रतीक है. दीपावली अकेला ऐसा पर्व है, जिसके पहले और बाद में दो-दो पर्व आते हैं. पहले धनतेरस और नरक चतुर्दशी. और बाद में गोवर्धन पूजा और भैया दूज. ठगी-धूर्तता, छीना-झपटी के इस दौर में हम इसका वास्तविक अर्थ नहीं समझ रहे हैं. इसका संदेश भूल रहे हैं. याद रखें, यह आंतरिक उल्लास, सद्भाव और सौहार्द्र का, नैतिक, बौद्धिक और आत्मिक समृद्धि का भी पर्व है. ‘पुत्र धरती का यही है, जो कभी तम से न हारा/ दीप माटी का हमारा.’

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