गरीबी नहीं, अमीरी हो चुनावी मुद्दा!

Published at :08 Feb 2014 4:25 AM (IST)
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गरीबी नहीं, अमीरी हो चुनावी मुद्दा!

।।जावेद इस्लाम।। (प्रभात खबर, रांची)आम चुनाव का प्रचार-पूर्व कार्यक्रम चालू है. चुनाव के मुद्दे क्या होंगे, होंगे भी या नहीं होंगे, यह प्रचार अभियान में पता चलेगा. पर एक बात तय है कि कम से कम ‘गरीबी’ चुनावी मुद्दा नहीं होगा. देश में गरीबी लंबे समय तक चुनावी मुद्दा रही है. सभी दल गरीबों की […]

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।।जावेद इस्लाम।।

(प्रभात खबर, रांची)
आम चुनाव का प्रचार-पूर्व कार्यक्रम चालू है. चुनाव के मुद्दे क्या होंगे, होंगे भी या नहीं होंगे, यह प्रचार अभियान में पता चलेगा. पर एक बात तय है कि कम से कम ‘गरीबी’ चुनावी मुद्दा नहीं होगा. देश में गरीबी लंबे समय तक चुनावी मुद्दा रही है. सभी दल गरीबों की चिंता में व गरीबी के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे हैं. इसकी चैंपियन कांग्रेस रही है. ‘गरीबी हटाओ’ उसका ट्रेडमार्क ही था.

मगर आजकल आम चुनाव में कोई दल गरीबी व गरीबों की बात करे, तो मजाक समझा जायेगा. भला गरीबी अब रही कहां? यह तो इतिहास की चीज हो चुकी है और इतिहास का भी अंत हो गया है. मनमोहन-मोंटेक की टीम पहले ही आंकड़ा से साबित कर चुकी है कि देश में कोई गरीब नहीं रहा. रोजाना 32 रुपये कमानेवाला शहरी व 26 रुपये कमानेवाला ग्रामीण गरीब नहीं, अमीर है! अब भला गांव या शहर में रोज इतनी रकम कौन नहीं कमाता? एक भिखारी भी भीख मांग कर इससे ज्यादा ही कमा लेता है, फिर अन्य लोगों की बात ही क्या? गरीबी तो समाजवादी दौर का कलंक थी. बाजारवादी दौर में एनडीए के ‘शाइनिंग इंडिया’ से लेकर यूपीए के ‘इमजिर्ग इंडिया’ के दौर में यह कलंक कब का धुल चुका है.

नरेंद्र मोदी का ‘वायब्रेंट गुजरात’ तो इस मामले में कांग्रेस-राज से दो कदम आगे निकल गया है. गुजरात में प्रतिदिन शहर में 17 व गांव में 11 रुपये कमानेवाला अमीर है. शाबाश! हर चीज में कांग्रेस व राहुल से आगे निकलते जाओ. चाहे नेतागीरी की चपड़-चपड़ हो, रुपया-फेंक धुआंधार चैनली प्रचार हो या सर्वे एजेंसियों की कृपा से सर्वाधिक सीट पाने की दावेदारी हो, हर मामले में ‘भाग मिल्ख भाग’ की तरह आगे बन रहे हो, तो गरीबी के नाश व अमीरी के ‘पुनर्वास’ में कांग्रेस से पीछे क्यों रहो? उनका 26 व 32 रुपये वाला अमीर, तो श्रीमान का 11 व 17 रुपयेवाला ही धनवान! अब कोई अभागा ही होगा जो देश में गरीब रह गया होगा.

मारो गोली उसे! सभी अमीर हो गये हैं, तो अब आम आदमी की परिभाषा बदलनी चाहिए. वैसे, यह बदल भी गयी है. यकीन न हो तो दिल्ली में ‘आप’ के आम आदमियों को देख लीजिए, उनमें कौन आरके लक्ष्मण का ‘कॉमन मैन’ है? इसलिए अब गरीबी नहीं, अमीरी चुनावी मुद्दा बनना चाहिए. मुद्दों की तलाश में शहर-शहर, गांव-गांव धूल फांक रहे राहुल जी इस पर ध्यान दें. चुनावी नारा हो-‘अमीरों को अब और अमीर बनाओ.’ जिस पार्टी का चाल-चरित्र-चिंतन इस नारे के साथ फिट होगा, वहीं 2014 में हिट होगी. माना मनमोहन मंडली ने देश में अनेक लखपती-करोड़पति बनाये, तो नमो-मंडली ने भी गुजरात में कुछ कम नहीं किया है. देखें, आम मतदाता इस बार किसका लोहा मानता है.

नवगठित फेडरल फ्रंट भी लाइन में आ खड़ा हुआ है. बेचारे सीपीआइ-सीपीएम गरीबों की बात करते-करते खुद गरीब हो गये हैं. तभी तो जयललिता और नीतीश बाबू के दरवाजे पर खड़े हैं.

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