क्यों भटक रहे हैं आज के युवा?

गुजरात के कपड़ा व्यापारी के बेटे के अपहरण में हो रहे रोज नये राजफाश से यह साफ हो गया कि बिहार-झारखंड में अपराधी गिरोहों के हौसलों में कोई कमी नहीं आ रही है. अब तक इस अपहरण कांड में एक दर्जन से अधिक युवक गिरफ्तार किये जा चुके हैं. हर गिरफ्तारी के बाद यह बात […]
गुजरात के कपड़ा व्यापारी के बेटे के अपहरण में हो रहे रोज नये राजफाश से यह साफ हो गया कि बिहार-झारखंड में अपराधी गिरोहों के हौसलों में कोई कमी नहीं आ रही है. अब तक इस अपहरण कांड में एक दर्जन से अधिक युवक गिरफ्तार किये जा चुके हैं. हर गिरफ्तारी के बाद यह बात सामने आ रही है कि अपहरण की फिरौती में करोड़ों कमाने की ख्वाहिश रखनेवाले ये युवक संपन्न घरों से आते हैं.
पढ़े-लिखे हैं. कुछ व्यवसाय करके अच्छा कमा रहे हैं. फिर इनके अपराध करने के मकसद को समझने की जरूरत है. अभी जो सामाजिक स्थिति है, उसमें लगातार उन लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ी है, जिनके पास धन है. लोग यह नहीं देख रहे हैं कि धन कैसे कमाया गया है. बिहार-झारखंड दोनों ही राज्यों में कानून या संस्थाओं के प्रति अनादर का भाव भी संपन्न वर्ग में ही है. गुजरात के व्यापारी के बेटे के अपहरण में शामिल युवकों की पारिवारिक पृष्ठभूमि देखिए, कोई पुलिस अधिकारी का बेटा है, कोई रेलवे ठेकेदार का.
ये व्यापार के सिलसिले में गाहे-बगाहे देश के दूसरे शहरों में भी आते-जाते हैं. इनके अपराध करने का या इसमें शामिल होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि युवाओं में एक झटके में ही धनवान होने की चाहत बढ़ी है. साथ ही उनमें यह भावना भी पैदा हो गयी है कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है. आनेवाले सालों में यह स्थिति और खराब होगी. युवाओं को अगर अपराध के रास्ते की ओर मुड़ने से रोकना है, तो कानून को सख्ती से पालन करवाने की जरूरत है. बिहार-झारखंड दोनों ही राज्यों में कानून का कितना असर है, यह सड़कों पर पता चल जाता है.
ट्रैफिक पुलिस डंडा दिखाता रहता है और रसूखदार लोग उसे चिढ़ाते हुए आगे बढ़ जाते हैं. लगातार कोशिश के बाद भी लोग ट्रैफिक रूल्स को मानने को तैयार नहीं है. ऊपरी तौर पर लगता है कि अपराध का और ट्रैफिक रूल्स नहीं मानने में आपसी रिश्ता नहीं है. लेकिन रिश्ता है. कानून के प्रति सम्मान का भाव रखने वाले समाज में अपराधियों के हौसले कभी बुलंद नहीं हो सकते हैं. सामाजिक स्तर पर सक्रिय संस्थाओं को युवाओं में बेहतर नागरिक के चरित्र गढ़ने के लिए अभियान चलाने की जरूरत है. साथ ही राजनीतिक दलों को भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. अन्यथा पुलिस कार्रवाइयों के भरोसे अपराध नहीं थमेंगे.
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