सरसैया क फुलवा झर लागा..

Published at :05 Feb 2014 3:54 AM (IST)
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सरसैया क फुलवा झर लागा..

।। चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) सरसों की धानी चादर पर पीली छींट बिखरी पड़ी है. फूल झर-झर करते हुए झड़ रहे हैं. घास की तलाश में निकली महिलाओं की टोली अचानक ठिठक जाती है. खेत के मेड़ पर दूसरी तरफ मुंह किये बिस्सू बनिया सस्वर सप्तम में हैं – हे….सरसैया क फुलवा झर लागा, फागुन में […]

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।। चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

सरसों की धानी चादर पर पीली छींट बिखरी पड़ी है. फूल झर-झर करते हुए झड़ रहे हैं. घास की तलाश में निकली महिलाओं की टोली अचानक ठिठक जाती है. खेत के मेड़ पर दूसरी तरफ मुंह किये बिस्सू बनिया सस्वर सप्तम में हैं – हे….सरसैया क फुलवा झर लागा, फागुन में बाबा देवर लागा.

महिलाए जानती हैं कि यह किसे सुनाया जा रहा है. आसरे की मौसी झुकी कमर पर हाथ रखती है. र्झुीदार चेहरे की आंख में हंसी तैरती है- मुहझौंसे.. फागुन का लगा कि बौरा गये? धनपत्ती (बिस्सू की बहन का नाम है ) के जा के सुना.

सभी महिलाएं हंसने लगती हैं. प्रौढ़ा, मुग्धा, जवानी की तरफ बढ़ी लल्ली भी खुल कर साथ देती है. मौसी खुरपी से इशारा करती है- अथी काट के खीसे में डाल देंगे. किलकारी ठहाका बन जाता है. क्योंकि मौसी ने बेलौस उस अंग का नाम लिया था, जिसे काटने की बात कही गयी थी. शहर होता तो चौंक जाता, गांव सब जानता है.

अगर ठोस और सच्चे समाज देखना हो, तो मेहरबानी करके समय निकालिए और गांव को देख आइए. आज आप चिंता कर रहे हैं कि पुरुष समाज ने औरतों की इच्छाओं को ही नहीं मारा है, उनके इंद्रियों को भी प्रतिबंधित कर दिया है. औरत खुल कर सड़क पर दौड़ नहीं सकती. वह खुल कर सड़क पर हंस नहीं सकती. चलते समय अगल-बगल देख नहीं सकती. लेकिन गांव खुल कर जीता है. हर रोज नहीं तो कम से कम कुछ खास मौकों पर तो खुल ही जाता है. बात करते हैं फागुन की! आइए देखिए गांव में क्या मौसम है.

आज बसंत पंचमी है. बंगाल का सौंदर्य आज सिंदूर और रोली से दहक रहा है. नृत्य, संगीत, विद्या, कला.. जीवन का रहस्य खुल रहा है. गुदगुदी हथेलियां हर दूसरे के माथे पर रोली लगा रही हैं- की काकी केमोन आछे? भाई मौका मिले तो देखो इस समाज को. उत्सव-पर्व एक ही है लेकिन हर जगह इसके मनाने के तरीके अलग हैं. विषय अलग है पर उल्लास एक ही है. शैव का शिव साधना में है, समाधि में जा चुका है. श्रृष्टि का होगा? काम देवता को कहा गया शिव को समाधि से निकालो. पार्वती पूर्ण हो चुकी हैं. मिलन में बिलंब हो रहा है.

बसंत उतरता है. मंद हवाओं में मादक महक है. कोयल बौरायी हुई पिहू पिहू कर रही है. वह आवाज देती है. आम की कोपलों से बौर झांक कर देखता है-किसने आवाज दी? बौर की महक अमराई में भर जाती है. शोर होता है बसंत आया रे; बसंत आया रे.. उघार होने का महीना. फागुन चढ़ेगा उसकी सूचना लेकर बसंत घूम रहा है. गली-गली में शोर कर रहा है. जड़-चेतन सब जवान हो गये. मुग्धाएं घूंघट की आड़ से ठिठोली कर रही हैं. देवर जनम का मुरहा है, मनबढ़ है. लाज-सरम सब धो के पी चुका है. बार-बार वही निहारता है. पुरवाई तो जन्म की बैरी है. अंचरा उड़ा देती है और अपने तो उठ कर पीपल की फुनगी पर जा बैठी है. यहां मनबढ़ देवर की निगाह.. रेडियो इ भी मुआ बे बखत गाना बजाता है- सूनी सेज गोद मोर सूनी मरम न जाने कोय.. चिखुरी की बोलती बंद. उनकी आंखे कहीं दूर अनंत में टिक गयी हैं.

गाना खतम लेकिन चिखुरी का करें. नवल ने धमार उठाया- इक सुंदर नारि नगीना बनी अठरंग है, छवि नैन विशाल, आस मोर सैयां क लाग रही, ना आये. लोक है, संगीत है, व्यथा है. गांव का टूटा हुआ अर्थशास्त्र है. गवना आ गया है. पर ‘वो’ तो परदेस कमाने गये हैं, कलकत्ते. मुलुक में बिछोह में जल रही नयी नवेली पिहंक रही है. फगुआ की ढोल पर नन्हकू सिंह हैं- लहुरी ननदिया ताना मारे, भौजी! तोर सैयां नादान. हाथे में ले ल बुकवाना मलि करहु सयान.. जियो जियो राजा..

इजलास तेवारी दम मार के उठे हैं. साथ हो लिये हैं. खन्ना केवट गमछा ओढ़ के नाच रहा है. रात के पहले पहर का यह जलसा होली तक चलेगा. कईयों की नींद जा चुकी होती है. सिसकिया आहिस्ता से निकल जाती है, बिछोह जो है. और जो संयोग में हैं- पंडित भीमसेन जोशी- सुन पावे मोर सास ननदिया और जागे दूजी जेठानिया.. बिछुआ बज रहा है. वाह पंडित जी, जिसने आपको नहीं सुना, उसकी जिनगी अकारथ.

मद्दू पत्रकार बड़े गौर से पंडित जी को सुन रहे हैं. उधर गाना खतम इधर नवल की साइकिल उठी, पहले घंटी बजी फिर मंह खुला- कहंवा बोले पपिहरा, कहंवा बोले मोर, कहंवा बोले कोयलिया, कहंवा पिय मोर.. कयूम मियां गुनगुनाये- नदी किनारे पपिहरा, बनवा बोले मोर. बगिया बोले कोयलिया, सेजिया पिय मोर..

चिखुरी ने जाकिट के खीसे से अबीर निकाल कर उड़ा दिया. मुट्ठी भर-भर के. चौराहे का रंग बदल गया, मौसम की तरह..

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