जादू गुरुजी का या फिर सरकार का?

Published at :04 Feb 2014 4:27 AM (IST)
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जादू गुरुजी का या फिर सरकार का?

दुमका में झारखंड मुक्ति मोरचा के 35वें स्थापना दिवस समारोह में भारी भीड़ रही. दूर-दूर से आये पार्टी के कैडर व समर्थक ठंड में देर रात तक जमे रहे. राजनीतिक दलों द्वारा शक्ति का ऐसा प्रदर्शन झारखंड में कभीकभार देखने को मिलता है. सवाल है कि क्या इससे झामुमो की राजनीतिक ताकत का आकलन किया […]

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दुमका में झारखंड मुक्ति मोरचा के 35वें स्थापना दिवस समारोह में भारी भीड़ रही. दूर-दूर से आये पार्टी के कैडर व समर्थक ठंड में देर रात तक जमे रहे. राजनीतिक दलों द्वारा शक्ति का ऐसा प्रदर्शन झारखंड में कभीकभार देखने को मिलता है.

सवाल है कि क्या इससे झामुमो की राजनीतिक ताकत का आकलन किया जा सकता है? शायद इसी संगठन के बल पर आज भी झारखंड में झामुमो की चलती है. शिबू सोरेन बेहिचक और बेबाकी से एलान करते हैं कि उनकी पार्टी को चुनाव की चिंता नहीं है. यह गुरुजी का सम्मोहन है या उनकी तपस्या की पूंजी? इस बात को प्रदेश के दूसरे राजनीतिक दलों को भी समझना होगा. आखिर गुरुजी ने ऐसा क्या कर दिया है कि कैडर उनके कहने भर से कुर्सी तक खाली करने को तैयार हैं. पहली बार मुख्यमंत्री बने हेमंत सोरेन ने समारोह को तो ऐतिहासिक बता दिया, लेकिन उनको भी इससे कुछ सीख लेने की जरूरत है.

अगर सरकार जनता के लिए ऐसा कुछ करती है, जैसा गुरुजी ने अपने आंदोलन काल में यहां के लोगों के लिए किया, तो निश्चित रूप से जनता भी झामुमो की अगुवाई वाली प्रदेश सरकार के प्रति ऐसा ही भाव रखेगी. सरकार का ध्यान जनहित के साथ-साथ संगठन की मजबूती पर भी है. इन दिनों राज्यसभा चुनाव के बाद झारखंड मुक्ति मोरचा में बिखराव आया है, उसको पाटना भी पार्टी की जिम्मेवारी है. समारोह में मुख्यमंत्री ने जनता के लिए कई घोषणाएं कीं, इनका लाभ देर-सबेर मिलेगा ही.

लेकिन यहां सवाल उठता है कि इन घोषणाओं पर कितना अमल हो पाता है? झारखंड में अगर मुख्यमंत्री पार्टी द्वारा घोषित योजनाओं की सही तरीके से मॉनिटरिंग कर उसका क्रियान्वयन करा लेते हैं, तो यह जनता को खुशहाली की ओर ले जाने में कारगर साबित हो सकता है. संगठन की मजबूती ही किसी राजनीतिक दल को जनता के करीब लाने के लिए काफी नहीं है, अपितु जनहित के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता और सरकार बनने पर उस पर तेजी से अमल भी प्रदर्शित करना होगा. झामुमो नेताओं को जनमुद्दों व जन- समस्याओं के बारे में और संवेदना दिखानी होगी. उन्हें यह सोचना होगा कि आखिरकार यह भीड़ उनसे क्या अपेक्षाएं रखती है?

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