सविता जी को सहानुभूति की जरूरत

एक सप्ताह भी नहीं हुआ था सुधीर महतो के स्वर्गवास को और उसके तुरंत बाद राजनीति शुरू हो गयी. शर्म आनी चाहिए ऐसे नेताओं और मंत्रियों को, जिन्होंने सुधीर जी की विधवा सविता जी को ऐसे समय पर राज्यसभा प्रत्याशी के लिए चुना. और शर्म से डूब जाना चाहिए उन नेताओं को जिन्होंने प्रत्याशी चुनने […]
एक सप्ताह भी नहीं हुआ था सुधीर महतो के स्वर्गवास को और उसके तुरंत बाद राजनीति शुरू हो गयी. शर्म आनी चाहिए ऐसे नेताओं और मंत्रियों को, जिन्होंने सुधीर जी की विधवा सविता जी को ऐसे समय पर राज्यसभा प्रत्याशी के लिए चुना.
और शर्म से डूब जाना चाहिए उन नेताओं को जिन्होंने प्रत्याशी चुनने के बाद उन्हें न जिता कर, बाहरी व्यक्ति के हाथों अपने समर्थन का सौदा कर लिया. दरअसल ऐसे समय पर प्रत्याशी घोषित करने की जरूरत ही नहीं थी. पूर्व सांसद सुनील माहतो के स्वर्गवास के बाद भी ऐसी ही राजनीति हुई थी. आखिर सविता जी का अपना भी व्यक्तिगत जीवन है. अब उन्हें कुछ पल अकेला छोड़ देना चाहिए. इस समय उन्हें सहानुभूति की जितनी जरूरत है, उतनी राजनीतिक कुरसी की नहीं. इस तरह प्रत्याशी घोषित करके रद्द करना, बड़े अपमान की बात है.
पालुराम हेंब्रम, सालगाझारी
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