खाली-पीली फुटेज काहे को खाना!

Published at :31 Jan 2014 4:05 AM (IST)
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खाली-पीली फुटेज काहे को खाना!

।। राजीव चौबे।। (प्रभात खबर, रांची) अब देखिए न! सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ को वैसी सफलता नहीं मिल सकी, जैसी उम्मीद उसके प्रोमोशन में लगे सलमान को देख कर लोगों ने लगा रखी थी. कहनेवाले कहते हैं कि यह सब सलमान की ही वजह से हुआ. न वह नरेंद्र मोदी के साथ पतंग […]

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।। राजीव चौबे।।

(प्रभात खबर, रांची)

अब देखिए न! सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ को वैसी सफलता नहीं मिल सकी, जैसी उम्मीद उसके प्रोमोशन में लगे सलमान को देख कर लोगों ने लगा रखी थी. कहनेवाले कहते हैं कि यह सब सलमान की ही वजह से हुआ. न वह नरेंद्र मोदी के साथ पतंग उड़ाने जाते, न उन्होंने मोदी को ‘गुड मैन’ कहा होता और न ही मोदी से खार खाया देश का एक तबका सलमान की फिल्म न देख कर उनके प्रति अपने गुस्से का इजहार करता.

लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि सलमान ने इस फिल्म के प्रोमोशन के लिए टीवी पर इतना फुटेज खाया, जितना इन्होंने अब तक कभी नहीं खाया था. हालांकि बॉलीवुड के भाई कहे जानेवाले सलमान खान जैसी शख्सीयत के लिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि उन्होंने फुटेज खाया, लेकिन अपनी नयी फिल्म के कमजोर पहलुओं को आभास उन्हें शायद पहले से ही हो गया था, इसीलिए वे शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और आमिर की ‘धूम 3’ की तुलना में अपनी नाक बचाने के लिए जी-जान से लगे थे.

खबरों में बने रहने के लिए उन्होंने वह कभी शाहरुख से गले मिलते, तो कभी मोदी के साथ पतंगबाजी करते दिखे. लेकिन यह सब करने से बेहतर होता कि उन्होंने समय रहते अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट और स्टारकास्ट पर काम किया होता, तो उन्हें बेवजह इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती. वैसे सलमान के लिए यह राहत की बात होगी कि उनकी यह फिल्म देर से ही सही, सौ करोड़ में शामिल हो चुकी है. वैसे अपने काम से ज्यादा टीवी फुटेज पाने की जुगत में रहने की यह केवल सलमान की भूल नहीं है. टीवी पर आज कल कई ऐसे चेहरे नजर आते रहते हैं जो महज चर्चा में बने रहने के लिए बेवजह फुटेज खाते रहते हैं. चाहे वह मोदी हों, दिग्विजय हों, केजरीवाल हों, या बिन्नी हों. इनकी दोस्ती भी फुटेज खाने के लिए होती है और दुश्मनी भी. कभी कोई खुद को ‘चायवाला’ और पिछड़ी जाति का कह कर प्रचारित करता है, तो कोई दूसरे को ‘राजकुमार’ और ‘शहजादा’ कहता है. कभी कोई सर्द रात में खुली सड़क पर रजाई ओढ़ कर धरने देता है, तो कोई सुबह नाश्ता करके अनशन पर बैठता है और दोपहर के खाने के वक्त पर उसे तोड़ भी देता है.

मकसद सिर्फ एक है, ज्यादा से ज्यादा फुटेज खाना और अधिक से अधिक लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना, ताकि बाद में उसे अपने-अपने तरीके से भजाया जा सके. इन सबको मीडिया फुटेज देकर मीडिया का भी अपना फायदा है, जिसे दिन भर का मसाला मिल जाता है और रोज-रोज एक ही चीज देखने-सुननेवालों को भी एक चेंज मिल जाता है. लेकिन इन सबके बीच ऐसा लगता है कि जनता ही सबसे बड़ी बेवकूफ है, जो बिना किसी माने-मतलब के मीडिया द्वारा उछाले गये मुद्दों को उछल-उछल कर लपकती है.

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