नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार

Published at :30 Jan 2014 4:19 AM (IST)
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नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार

।। शुजात बुखारी।। (वरिष्ठ पत्रकार) विभाजन से पहले के जम्मू-कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच व्यापार तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद, भारत-पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर वर्ष 2003 में युद्ध विराम की घोषणा के बाद शुरू हुई शांति प्रक्रिया की एक बेहद अहम उपलब्धि है. कश्मीर में पर्यटन कारोबार की बहाली की महत्वाकांक्षाओं के […]

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।। शुजात बुखारी।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

विभाजन से पहले के जम्मू-कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच व्यापार तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद, भारत-पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर वर्ष 2003 में युद्ध विराम की घोषणा के बाद शुरू हुई शांति प्रक्रिया की एक बेहद अहम उपलब्धि है. कश्मीर में पर्यटन कारोबार की बहाली की महत्वाकांक्षाओं के बीच पहले ङोलम घाटी के नाम से विख्यात श्रीनगर-मुजफ्फराबाद सड़क मार्ग पर और फिर जम्मू के पूंछ-रावलकोट सेक्टर के बीच बस सेवा की शुरुआत हुई.

राज्य सरकार द्वारा अमरनाथ श्रइन बोर्ड को जमीन आवंटित किये जाने को लेकर हुए सांप्रदायिक संघर्ष के बाद अक्तूबर, 2008 में नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार की ठोस शुरुआत हुई. हालांकि इस जमीन आवंटन का व्यापार की शुरुआत करने से कुछ भी लेना-देना नहीं था, भारत और पाकिस्तान विश्वास बहाली की प्रक्रिया के तहत इस व्यापार के लिए पहले ही तैयारी कर चुके थे. लेकिन जमीन आवंटित किये जाने का कश्मीरियों के द्वारा जोरदार विरोध के जवाब में जम्मू के कारोबारियों द्वारा आर्थिक नाकेबंदी किये जाने पर परंपरागत मुजफ्फराबाद मार्ग को खोलने की मांग जोर पकड़ने लगी थी.

आखिर भूमि विवाद को खत्म करने और विश्वास बहाली को बढ़ावा देने की नीति के तहत इस मार्ग को फिर से खोलने पर दिल्ली और इसलामाबाद राजी हो गये. हालांकि इसके लिए यहां के लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ी. इस मार्ग के खुलने से पहले, 11 अगस्त, 2008 को मुजफ्फरबाद चलो मार्च की अगुवाई करनेवाले सीनियर अलगाववादी नेता शेख अब्दुला अजीज समेत 60 लोग पुलिस फायरिंग में मारे जा चुके थे. इस मार्च को सभी अलगाववादियों का समर्थन हासिल था, यहां तक कि कट्टरपंथी सैय्यद अली गिलानी का भी.

पिछले वर्षो में उतार-चढ़ावों के बावजूद नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार में लगातार बढ़ोतरी हुई है. हालांकि यह भी सही है कि पर्याप्त बुनियादी ढांचे और बैंकिंग जैसी सुविधाओं की कमी इसमें रोड़ा अटका रहे हैं. साथ ही, दोनों पड़ोसी देशों के बीच समय-समय पर तनावपूर्ण स्थिति पैदा होने के कारण इन अवरोधों में वृद्धि हुई है. फिर भी कश्मीर के रास्ते दोनों देशों के बीच व्यापार से जुड़े प्रमुख कारोबारी इसे आगे बढ़ाने के लिए अपने स्तर पर तमाम कोशिशें जारी रखे हुए हैं. लेकिन नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार बढ़ाने की कोशिशों को उस समय तगड़ा झटका लगा, जब जनवरी के तीसरे सप्ताह में मुजफ्फरबाद से आये ट्रक में 114 पैकेट ब्राउन शुगर पकड़ा गया. बादाम से लदे इस ट्रक की भारतीय सीमा में रोक कर की गयी जांच में यह बरामदगी हुई. पुलिस के मुताबिक ये बादाम बांदीपुरा में एक भारतीय कारोबारी के लिए लाये जा रहे थे. इस पाकिस्तानी ट्रक और उसके ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद दोनों देशों में कई ट्रक ड्राइवरों को हिरासत में लिया जा चुका है.

हालांकि यह पहली मर्तबा नहीं है जब यहां ट्रक में प्रतिबंधित सामान पकड़े गये हैं, लेकिन इससे पहले पकड़े गये सामानों की मात्रा बहुत कम थी. 2008 में दोनों मुल्कों के बीच कश्मीर के रास्ते कारोबार शुरू होने के बाद से यह ड्रग्स की अब तक की सबसे बड़ी बरामदगी है. इस बार जब्त किये गये 114 किलोग्राम प्रतिबंधित सामान की कुल कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 560 करोड़ रुपये तक बतायी जा रही है. पुलिस सू़त्रों के मुताबिक इस ब्राउन शुगर को श्रीलंका भेजा जाना था.

इस बरामदगी से न केवल नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार को भारी नुकसान पहुंचा है, बल्कि दोनों पक्षों के अड़ियल रवैये के कारण इसके बंद होने के भी खतरे मंडराने लगे हैं. पाकिस्तानी ट्रक भारत में पकड़े जाने के बाद पाकिस्तान ने सीमा पार से कारोबार ही रोक दिया. इस पर भारत ने पाकिस्तान के उच्चायुक्त को बुला कर विरोध जताया. भारत का कहना है कि ऐसी हरकतों से मामला खराब हो सकता है.

अब इस ड्रग्स तस्करी की पुलिस जांच में चाहे जो भी बात सामने आये, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान की सरकार नियंत्रण रेखा के आर-पार जारी व्यापार को स्मगलरों और दूसरे अवांछित तत्वों से सुरक्षित रखने में असफल रही है. इस बरामदगी के बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं, मसलन ब्राउन शुगर को किस जगह ट्रक में लादा गया था, इसे वास्तव में कहां भेजा जाना था और इस पूरे मामले में किस स्तर के अधिकारी शामिल थे, क्योंकि ब्राउन शुगर को पाक अधिकारियों की मर्जी और मिलीभगत के बिना इस पार भेजा जाना संभव नहीं था.

दुर्भाग्य की बात यह है कि अब इस मसले को सुलझाने के बजाय दोनों देश जैसे को तैसा की नीति अख्तियार करते दिखाई पड़ रहे हैं. सबसे पहली बात जो सामने आ रही है वह यह है कि स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिड्योर (एसओपी) इस तरह के हालात को द्विपक्षीय आधार पर सुलटाने में असफल रहा है. पाकिस्तान जहां इसके लिए जिम्मेवार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने से कतरा रहा है, वहीं भारत भी अब तक किसी समाधान की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया है. ध्यान रखा जाना चाहिए कि दोनों देशों के बीच व्यापार को बंद करना इसका उचित समाधान नहीं है. वाघा सीमा के जरिये भी दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार हो रहा है और उस मार्ग पर भी प्रतिबंधित सामान पकड़े जा चुके हैं, लेकिन वहां से इसके बाद व्यापार को बंद नहीं किया गया. ऐसे में कश्मीरियों की उस आशंका को बल मिलता है कि भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार से असहज महसूस करते हैं और दोनों अपने-अपने व्यापार को लेकर ज्यादा चिंतित हैं.

यह सही है कि कश्मीर दोनों पड़ोसी देशों के बीच विवाद एक अहम मुद्दा है. लेकिन जबतक भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा के आर-पार द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए व्यावहारिक प्रक्रिया नहीं अपनाते हैं, तबतक दूसरे मोरचों पर भी उनके लिए आगे बढ़ना मुश्किल बना रहेगा. नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार इस लिहाज से भी अहम है कि इससे 1990 के बाद पाकिस्तान शासित कश्मीर चले गये सैकड़ों कश्मीरी युवाओं को सम्मानजनक पुनर्वास में मदद मिल रही है. अगर दोनांे देश इस तथ्य को ध्यान में रखें, तो इस द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों को सुलझाने में ज्यादा मुश्किलें नहीं आएंगीं. नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार कश्मीर के दोनों तरफ के लोगों के हित में है. लिहाजा यह भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों के सरकारों की जिम्मेवारी है कि वे कश्मीरियों के हितों का ख्याल रखें.

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