दृश्य मीडिया का चुनावी सर्वेक्षण

।। सुभाष चंद्र कुशवाहा।। (साहित्यकार) चुनाव आयोग जब मतदाताओं को जागरूक करने की तैयारी में है, ठीक उसी समय हमारा दृश्य मीडिया यूपी और बिहार के चुनावी सर्वेक्षणों को प्रसारित कर मतदाताओं को यह समझाने में लग गया है कि जिसे प्रधानमंत्री बनना है, वह बन चुका है. तुम नाहक जागरूक बनने की कोशिश कर […]
।। सुभाष चंद्र कुशवाहा।।
(साहित्यकार)
चुनाव आयोग जब मतदाताओं को जागरूक करने की तैयारी में है, ठीक उसी समय हमारा दृश्य मीडिया यूपी और बिहार के चुनावी सर्वेक्षणों को प्रसारित कर मतदाताओं को यह समझाने में लग गया है कि जिसे प्रधानमंत्री बनना है, वह बन चुका है. तुम नाहक जागरूक बनने की कोशिश कर रहे हो. सोये रहो. हम हैं न प्रधानमंत्री बनाने के लिए? अब दृश्य मीडिया से कौन सवाल करे कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप कहां थे और ‘आप’ कहां थी, सूंघ पाये क्या?
भारतीय मतदाताओं की समझ और मत समीकरणों का ठीक-ठीक विश्लेषण, महानगरीय दृश्य मीडिया के रैंडम सर्वेक्षणीय निष्कर्षो से नहीं जाना जा सकता. अनपढ़ या अल्पशिक्षित समझे जानेवाले मतदाताओं की जागरूकता या अंतिम पलों में बदलनेवाली राय को समझने के लिए गांवों की चुप्पी और चालाकी की आबो-हवा में पैठ बनाना होगा.
दृश्य मीडिया वहां नहीं जाता. वह जहां सांस लेता है, वहीं ध्वस्त हो जाता है. तब बाकी जगहों के बारे में अपने सर्वेक्षणों के सहारे, वह महज कुछ गुप्त एजेंडे को कार्यरूप देने की चालाकी के अलावा कुछ नहीं करता. दिल्ली विधानसभा चुनाव में उसके सर्वेक्षण नकारा साबित हुए. पर मीडिया की भविष्यवाणी का क्या? वह फिर धूल झाड़ कर खड़ा हो गया है और यूपी तथा बिहार के चुनावी नतीजों को अभी से घोषित करने लगा है.
दृश्य मीडिया की आत्मा से ‘नमो-नमो’ के अलावा और कोई आवाज नहीं निकलती. तभी तो उसने चुनावी समीकरणों के प्रकाश में आये बिना या उम्मीदवारों के घोषित हुए बिना ही यूपी और बिहार में विजय रथ दौड़ा दिया है. उसने ‘आप’ के उभार को देखते हुए भी, बदल रहे समाज की कुलबुलाहट को समझने की जरूरत नहीं समझी है. उसने यह भी साफ कर दिया है कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा. देश के दो हिंदी प्रदेशों में, जहां लोकसभा की ज्यादा सीटें हैं, मतदाताओं को प्रभावित करने का सरल औजार चुनाव सर्वेक्षण से बेहतर कुछ नहीं होता. इसीलिए दृश्य मीडिया चुनावी सर्वेक्षणों की जल्दबाजी में हाथ मारना चाहता है. मगर उसे याद रखना होगा कि इससे पहले इन प्रदेशों के तमाम चुनाव परिणामों का अनुमान लगाने में वह असफल रहा है.
दृश्य मीडिया विगत साल भर से प्रधानमंत्री पद को लगभग आरोपित करने पर तुला हुआ है. सारी बहसों को वह परिवारवाद के विरुद्घ मोड़ते हुए, व्यक्तिवाद की ओर मोड़ने में लगा हुआ है. वह यह नहीं बताता कि अगर लोकतंत्र के लिए परिवारवाद घातक है, तो व्यक्तिवाद तो और भी खतरनाक है. संभवत: वह विकास को बाजार और सामाजिक समरसता से ज्यादा जरूरी समझ रहा है. उसकी टीआरपी, गुजरात मॉडल, वहां की प्रायोजित संस्कृति, बेशर्मी और थेथरई बताने से बढ़ रही है. कुल मिलाकर मीडिया की यह पूरी कवायद भारतीय मतदाताओं की समझ को भोथरा करने और हवा के रुख को अपने हित में मोड़ने का कुचक्र है.
कॉरपोरेट संचालित मीडिया जनता को माल समझता है, जिसे खरीद कर अपने उत्पाद को जनता पर थोपता है. मगर उसे यह भी समझना होगा कि भारतीय मतदाताओं को हमेशा उनकी ललचाई नजरों से नहीं समझा जा सकता. तमाम प्रलोभनों को स्वीकारने के बाद भी भारतीय मतदाता अपने स्वतंत्र निर्णय को बनाये रखने में लगे रहते हैं.
चुनावी सर्वेक्षण को चुनावी समीकरणों से पहले प्रसारित करने का उतावलापन, एक खास दल के पक्ष में बयार बहाने और कुलीनतावादी पक्षधरता को हर हाल में बनाये रखने की नीति का अंग है. यूपी की राजनीति में हाशिये के समाज की जो दावेदारी 90 के दशक में थी, कुछ उतार-चढ़ावों के बावजूद वह आज भी बरकरार है. किसी के पास दलित मतों के, तो किसी के पास मुसलिम मतों के ध्रुवीकरण के चलते सत्ता की चाबी सपा-बसपा के बीच बंटती रहती है. यूपी की घोर उपेक्षा के बावजूद, समाज के व्यापक तबके ने अब भी राज्य के समर्थ वर्ग की आक्रामकता का प्रतिकार करने के लिए दलितों-पिछड़ों के रूप में अपनी गोलबंदी को बनाये रखना बेहतर समझा है. बिहार की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. जातिदंश और सामंती संस्कृति से कराहते बिहार की जनता का निर्णय वैसा ही होगा, जैसा मीडिया चाहता है, इसमें संदेह है.
राष्ट्रीय पार्टियों के लिए यूपी और बिहार के बीहड़ों से गुजरते हुए दिल्ली पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है. क्षेत्रीय दलों के तिलिस्म को इतनी आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता है. ऐसे में मीडिया को अपना ध्यान लोकतंत्र में पैठ बना चुके भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भुखमरी, कृषि की तबाही, किसानों की आत्महत्या और आतंकवाद पर केंद्रित करना चाहिए, जिससे मतदाता अंधराष्ट्रवादी नारों और विकास के हवाई दावों के असर में आये बिना, आगामी चुनाव में देशहित में फैसला ले सकें.
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