एक बेटी ऐसी भी

Updated at : 01 Aug 2016 3:21 AM (IST)
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एक बेटी ऐसी भी

पंद्रह हजार की पेंशन पर आश्रित पचहत्तर साल के एक विधुर पिता-जीवन को लखनऊ पसंद है. सारे रिश्तेदार और दोस्त सब यहीं हैं और अच्छे पड़ोसी भी यहीं हैं. आखिरी सफर में चार कंधे किराये पर नहीं लेने पड़ेंगे. लेकिन, उसकी एकमात्र औलाद बेटी को दिल्ली पसंद है. कैरियर तो यहीं है. बेटी को आने […]

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पंद्रह हजार की पेंशन पर आश्रित पचहत्तर साल के एक विधुर पिता-जीवन को लखनऊ पसंद है. सारे रिश्तेदार और दोस्त सब यहीं हैं और अच्छे पड़ोसी भी यहीं हैं. आखिरी सफर में चार कंधे किराये पर नहीं लेने पड़ेंगे. लेकिन, उसकी एकमात्र औलाद बेटी को दिल्ली पसंद है. कैरियर तो यहीं है. बेटी को आने की फुरसत नहीं थी. काम जो बहुत है उसे. अब पिताजी तो ठहरे रिटायर, फालतू आदमी. अक्सर चल देते हैं दिल्ली. अबकी बार बहुत दिन बाद जा रहे हैं, उनके मन में बहुत उत्साह है. बेटी-दामाद और नाती-नातिन के लिए ढेर सामान खरीदा है. बीस हजार तो खर्च हो ही गया. इधर उनके दामाद जी ने शहर के एक पॉश इलाके में आलीशान फ्लैट खरीदा था, जिसे वह पहली बार देखेंगे.

लेकिन उन्हें धक्का लगा. स्टेशन पर उन्हें रिसीव करने कोई नहीं आया. मोबाइल पर बेटी ने कहा कि हम बहुत बिजी हैं. आप टैक्सी में बैठ जाओ. ड्राइवर से बात करा देना. मैं उसे लोकेशन समझा दूंगी. घर की चाबी सिक्योरटी गार्ड के पास है. शाम को मिलते हैं सब. सामान ज्यादा देख कर कुली ने तीन सौ मांगे और फिर टैक्सीवाले ने आठ सौ रुपये मांग लिये. वे घबरा गये. अगर बेटी रिसीव करने आ जाती, तो यह सारे पैसे बच जाते और सबसे बड़ी बात तो यह है कि बुढ़ापे की जिस्मानी तकलीफ से बच जाते.

जैसे-तैसे करीब दो घंटे के बाद वह अपनी बेटी के घर पहुंचे. टैक्सीवाला भन्नाया. एड्रेस सही होता, तो फालतू घूमना नहीं पड़ता. टाइम और पेट्रोल एक्स्ट्रा खर्च हुआ, इसलिए सौ रुपये और दीजिये. सिक्योरिटी गार्ड से चाबी ली. चार बेडरूम का फ्लैट वाकई बहुत बढ़िया था. लेकिन, किचन खाली मिला और फ्रिज में भी कुछ नहीं था. वे कुछ बिस्कुट अपने साथ लाये थे, उसी से गुजारा किया.

शाम को अपने दोनों बच्चों को क्रश से बटोरती हुई बेटी घर आयी. फिर दस मिनट बाद दामाद जी ने आते ही अहसान किया. आज आप आये हैं, इसलिए सारा इंपोर्टेंट काम छोड़ कर आॅफिस से जल्दी घर आना पड़ा.

कौन बनाये खाना? अपने-अपने काम से लौट कर सब तो थके हुए हैं. सो डिनर आॅर्डर कर दिया. बेटी ने पूछा- पापा, आपने वापसी का रिजर्वेशन कबका कराया है? इन फैक्ट, पांच दिन बाद हमें सिंगापुर घूमने जाना है.

पिता जी सोचने लगे. महज तीन साल की थी बेटी, जब पत्नी गुजर गयी. बड़े प्यार-दुलार और नाज-नखरों से मां बन कर बेटी को पाला-पोसा. पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाया और फिर अच्छे घर में शादी कर दी. बेटी के लिए जीवन की सारी पूंजी लगा दी. और विडंबना देखिये कि बेटी ने पहुंचते ही अपना टूर प्रोग्राम बता दिया. हृदय विदीर्ण हो गया उसका. वह तो महीने भर का प्रोग्राम बना कर आये थे. बमुश्किल आंसू रोके और बोले कि परसों सुबह शताब्दी का रिजर्वेशन है.

दो दिन बाद सुबह चार बजे टैक्सी आयी. दामाद जी और बच्चे सो रहे हैं. बेटी की आंखों में भी नींद भरी है. टाटा हुई और टैक्सी का दरवाजा बंद. पिताजी दिल्ली स्टेशन के पास किसी होटल में ठहर गये. हजार रुपये टैक्सी को दिये. रिजर्वेशन के लिए पांच सौ एक्स्ट्रा ट्रेवल एजेंट को दिये. अगले दिन सुबह लखनऊ पहुंच गये.

बंदे से बोले, महानगरों की संस्कृति बदल गयी है. किसी के पास फुरसत ही नहीं है. रिसीव करने और सी-ऑफ करने का इवेंट मुद्दत हुआ अब. तकरीबन खत्म हो चुका है. फिर दिल्ली देश की राजधानी है, वहां जाम बहुत है. अब तो खुद ही ऑटो-टैक्सी करके चले आओ और चले भी जाओ.

वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

chhabravirvinod@gmail.com

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