आर्थिक गैर-बराबरी पर चिंतन का वक्त

Published at :22 Jan 2014 3:38 AM (IST)
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आर्थिक गैर-बराबरी पर चिंतन का वक्त

दुनिया के ज्यादातर देशों में लोकतंत्र है और जहां नहीं हैं वहां लोकतंत्र बहाली के आंदोलन चल रहे हैं, क्योंकि सैद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा को सर्वाधिक महत्व प्राप्त है. लेकिन, लोकतंत्र को आकर्षक बनानेवाली यही बात उसे अंतर्विरोधी भी बनाती है. किसी व्यक्ति या समूह की आजादी के मूल्य […]

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दुनिया के ज्यादातर देशों में लोकतंत्र है और जहां नहीं हैं वहां लोकतंत्र बहाली के आंदोलन चल रहे हैं, क्योंकि सैद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा को सर्वाधिक महत्व प्राप्त है. लेकिन, लोकतंत्र को आकर्षक बनानेवाली यही बात उसे अंतर्विरोधी भी बनाती है.

किसी व्यक्ति या समूह की आजादी के मूल्य को ज्यादा तरजीह दी जाये तो वह शेष व्यक्तियों की आजादी, बराबरी और भाईचारे में बाधक बनती है. ऐसे में लोकतंत्र की बुनियादी मान्यता यानी हरेक व्यक्ति की स्वतंत्रता व गरिमा की स्थापना का मूल्य क्षतिग्रस्त होता है. लोकतांत्रिक व्यवस्था के इस अंतर्विरोध को स्वयंसेवी संस्था ऑक्सफैम की नयी रिपोर्ट ने बखूबी उजागर किया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की आबादी सात अरब और कुल दौलत 2,41,000 अरब डॉलर है, पर कुल दौलत में कुल आबादी का हिस्सा हैरतअंगेज गैर-बराबरी से भरा है.

दुनिया की 46 फीसदी (1,10,000 अरब डॉलर) दौलत पर सिर्फ एक फीसदी सर्वाधिक धनी लोगों की मिल्कियत है. दुनिया के सिर्फ 85 लोगों के पास मौजूद दौलत दुनिया की आधी आबादी की कुल संपत्ति से ज्यादा है. आज विश्व के हर दस व्यक्ति में सात उन देशों के निवासी हैं, जहां गैर-बराबरी गत तीस वर्षो में सबसे तेजी से बढ़ी है. भारत का ही उदाहरण लें तो देश में खरबपतियों की संख्या बीते एक दशक में छह से बढ़ कर 61 हो गयी है और 1 अरब 21 करोड़ लोगों के इस देश में मात्र 61 लोगों के पास कुल 250 अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति है.

भारत में बीते एक दशक में गैर-बराबरी इतनी तेजी से बढ़ी है कि 2003 में देश की कुल संपत्ति में सर्वाधिक धनी लोगों का हिस्सा 1.8 फीसदी था, जो 2008 में बढ़ कर 26 फीसदी हो गया. गैर-बराबरी को उजागर करती यह रिपोर्ट ऐसे समय में आयी है, जब नयी वैश्विक अर्थव्यवस्था की पक्षधर ‘वर्ल्डइकोनॉमिक फोरम’ की बैठक दावोस में होनेवाली है. फोरम ने इस दफे बैठक का मुख्य विषय ‘बढ़ती आर्थिक-असमानता’ को ही बनाया है. थोड़े से लोगों के हाथ में आर्थिक संसाधनों का केंद्रित होना शांतिपूर्ण विश्व-व्यवस्था के लिए खतरा है. दुनियाभर में लोगों के बीच आर्थिक गैर-बराबरी के कारण बढ़ते सामाजिक तनाव से सामाजिक व्यवस्थाओं के भंग होने का खतरा बढ़ता जा रहा है!

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