राह-ए-मुहब्बत पर बिना अंजाम के

Published at :18 Jan 2014 3:24 AM (IST)
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राह-ए-मुहब्बत पर बिना अंजाम के

।। कमलेश सिंह।। (इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक) प्रभु ने कहा पड़ोसी से प्रेम करो. नजदीकियां दूरियां बन जाती हैं, अजब इत्तेफाक है. आस-पड़ोस से आस नहीं रहती. रिश्तों में मिठास नहीं रहती. पर चारदीवारी के आर-पार भी हो जाते हैं नैना चार. नियंत्रण रेखा है, पर कुछ लोगों का स्वयं पर नियंत्रण […]

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।। कमलेश सिंह।।

(इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक)

प्रभु ने कहा पड़ोसी से प्रेम करो. नजदीकियां दूरियां बन जाती हैं, अजब इत्तेफाक है. आस-पड़ोस से आस नहीं रहती. रिश्तों में मिठास नहीं रहती. पर चारदीवारी के आर-पार भी हो जाते हैं नैना चार. नियंत्रण रेखा है, पर कुछ लोगों का स्वयं पर नियंत्रण नहीं है. जरूरी नहीं कि यह आफत को आमंत्रण ही हो. लेकिन नियंत्रण के बाहर मंत्री हो जायें, तो मंत्रणा जरूरी है.

भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध बनते-बिगड़ते रहते हैं. दोनों देशों की हुकूमतें भले एक दूसरे को दांत दिखाएं, पर दोनों देशों की अवाम तो मुहब्बत का पैगाम एक दूसरे को भेजती रहती है. दिल कबूतर है, एलओसी के ऊपर उड़ता है. ऊपर वाले की मेहर है, तो अमन की आशा बनी रहती है. शोएब और सानिया के मामले में वहां का अमन और यहां की आशा. इस बार अमन यहां का है और आशा वहां की.

शशि थरूर सिर्फ सत्तावन साल के युवा हैं, हैंडसम हैं, मंत्री हैं. ऑक्सफोर्ड वाली अंगरेजी बोलते हैं, तो शोखियों में शराब घोलते हैं. मेहर तरार महज पैंतालिस की हैं, लिखती हैं और खुदा के खैर से बहुत खूबसूरत दिखती हैं. थरूर शादीशुदा हैं, यह ख्याल उनके जेहन से जुदा हुआ भी तो कैसे! तीन बार शादी कर चुका आदमी चौथी की सोचता है? एक बार शादी कर चुका आदमी यह सोच-सोच के बचे बाल नोंचता है. सुनंदा पुष्कर के पति को, भारत के एक माननीय मंत्री को पाकिस्तान की एक पत्रकार से, मेहर तरार के दिल-ए-बेकरार से बीबीएम वार्ता करने के पहले इतना तो ख्याल आना चाहिए था कि दाग लगी तो चुनरिया खुल्ले में सूखेगी. ट्विटर का पक्षी अंगरेजी बीट करेगा. 140 अक्षरों में छवि का वो क्षर होगा कि निरक्षर लोगों से रीस होगी. सालों सालेगी, ऐसी टीस होगी. पत्नी की खीस पर्सनल है, पर मामला तो नेशनल है.

भारत-पाकिस्तान के बीच मीठे संबंधों में कश्मीर आड़े आता है. भारत-पाकिस्तान के बीच इस मीठे संबंध को कश्मीर की पुष्कर ने आड़े हाथों ले लिया. सुनंदा जब राज खोलने पे उतरीं, तो आगे-पीछे का ख्याल नहीं रखा. देश को आज पता चला कि आइपीएल की कोच्चि टीम के मामले में थरूर गलत नहीं फंसे थे. सुनंदा के मुताबिक उन्होंने थरूर के अपराध को अपने सर ले लिया था. अपराध, जिसे वह स्वेट इक्विटी बता रहे थे, वह हसीना का पसीना भर नहीं था. कुछ हसीन खताएं भी हुई थीं, कुछ अपराध भी हुए थे. बीती बातों में ना भी जाएं, तो भी इसे निजी कह कर कालीन के नीचे बुहारा नहीं जा सकता. थरूर से एक्सटर्नल अफेयर मंत्रलय भले छिना पर थोड़े अरसे के बाद मानव संसाधन मंत्रलय मिल गया. यहां भी एक्सटर्नल अफेअर? वह भी दबा के. छुपा के. सात फेरों की शपथ भुला के. फिर कैसे यकीन करें कि पद और गोपनीयता की शपथ को भुला नहीं दिया होगा! पाकिस्तान की एक महिला से भारत के राजनयिकों/राजनीतिकों के संबंध जटिल होते हैं, गहन नहीं. अंतरंग तो हरगिज नहीं. नीयत में गोपनीयता होती, तो पद छोड़ देते और वाघा की ओर दौड़ लेते. मिनिस्टर, सिनिस्टर में एक ही चल सकता है. दो लोगों के बीच का मामला निजी होता है. तीन लोगों की तो भीड़ होती है. यहां मामला सवा सौ करोड़ लोगों के भरोसे के भसम होने का भी है, जिन्हें गोपनीयता की रस्मी कसम पर विश्वास है.

यह एक सामान्य पति, पत्नी और वो का कलह नहीं है. थरूर कह रहे हैं पत्नी पुष्कर की तबीयत नासाज है. उनकी निजता को अभी नुकसान नहीं पहुंचाया जाए. मरीज का इलाज जरूरी है, पर ऐसे सीरियस मरीज-ए-मुहब्बत के इलाज में भी देरी अच्छी नहीं. थरूर को यह तो जरूर बताना चाहिए कि मंत्री के रूप में जो बातें उनकी जानकारी में आयीं या लायी गयीं, उनकी गोपनीयता अक्षुण्ण है. उनकी निजता देशहित से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है. तिरुवनंतपुरम से सांसद थरूर अपने क्षेत्र में बहुत काम करते हैं. जितना करते हैं, सब ट्विटर पर प्रचारित करते हैं. आप उनकी प्रशंसा कर दें तो उसे भी प्रसारित करते हैं. उनके टाइमलाइन से वाकिफ लोग चकित रहते हैं कि एक मंत्री इतना काम कैसे करता है? करता है तो उसे प्रचारित करने का वक्त कैसे निकाल लेता है? न सिर्फ वह ढेर सारा काम निपटाते हैं, लिखते हैं, पढ़ते हैं, बल्कि घर के इतर महिलामित्रों के लिए भी वक्त निकाल पाते हैं. इश्क ने गालिब को निकम्मा कर दिया था, थरूर तो आदमी हैं काम के. कैसे निकल पड़े राह-ए-मुहब्बत पर, बिना फिक्र-ए-अंजाम के. पतंगे की फितरत वाले आग से खेलते हैं. खामोश देहलवी माफ करें, पर इस रंज पे थोड़ा तंज तो हो- आग को खेल पतंगों ने समझ रखा है, सबको अंजाम का डर हो ये जरूरी तो नहीं; सब की साकी पे नजर हो ये जरूरी है मगर, सब पे पाकी की मेहर हो ये थरूरी तो नहीं!
(यह लेख सुनंदा पुष्कर की मौत से पहले लिखा गया था)

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