रेडियो के मेला में ओढ़ना हेरा आयी..

Published at :17 Jan 2014 3:46 AM (IST)
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रेडियो के मेला में ओढ़ना हेरा आयी..

।। पुष्यमित्र ।। (पंचायतनामा, रांची) धमदाहा दक्षिण टोला की बोकिया रेडियो का नाम सुनते ही बिगड़ जाती है. आबै लेबे न करबै.. पांच सौ टका के रेडियो के फेरा में हमरो दू सौ टका के ओढ़ना हेराय गेलै आरु तीन दिन के मजूरी के घाटा अलगे.. बोकिया को पता चला कि सरकार उसकी जाति के […]

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।। पुष्यमित्र ।।

(पंचायतनामा, रांची)

धमदाहा दक्षिण टोला की बोकिया रेडियो का नाम सुनते ही बिगड़ जाती है. आबै लेबे न करबै.. पांच सौ टका के रेडियो के फेरा में हमरो दू सौ टका के ओढ़ना हेराय गेलै आरु तीन दिन के मजूरी के घाटा अलगे.. बोकिया को पता चला कि सरकार उसकी जाति के लोगों (महादलितों) को मुफ्त में रेडियो दे रही है. इस भीषण ठंड में जब सूरज भगवान भी छुट्टी पर चले गये हैं, गरीब विधवा बोकिया रेडियो के लालच में तीन किमी पैदल चल कर रोज धमदाहा प्रखंड मुख्यालय जाती है और शाम को खाली हाथ लौट आती है. वह भीड़ में हर जैकेटवाले से कहती है कि उसका नाम ढूंढ़ कर रेडियो दिलवा दे. मगर अकेली विधवा की बात पर कौन कान दे? आज तो भीड़ में कहीं उसका ओढ़ना भी गिर गया. ऐन शीतलहरी में वह शाम को कांपती हुई घर लौटी.

पड़ोस का एक बूढ़ा कहता है, बोकिया को रेडियो नहीं मिलेगा. जब लिस्ट बन रहा था तो इ फलाना बाबू के यहां बरतन मांजने गयी थी. इसका नाम ही नहीं चढ़ा है. नाम लिखनेवाला 20 टका फी आदमी ले रहा था, इसके बदले पैसा कौन देता और दे भी देता तो उसको यह घुराती कैसे. हालांकि, खुद इस बूढ़े को भी रेडियो नहीं मिला है, मगर उसको उम्मीद है कि दो-तीन दिन में मिल जायेगा. टोले के एक युवक ने उससे 50 रुपया लेकर वादा किया है कि रेडियो दिला देगा. इस पर बोकिया कहती है, पचास टका त निहये देबै.. रेडियो से की पेट भरते बाबू.. अभी ओढ़ना-कंबल के काम छै, सरकार रेडियो बंटवाबै छै.

टोले में रजक लोगों के सात परिवार हैं, जिनमें से दो को रेडियो मिला है, पांच भटक रहे हैं. जिनको नहीं मिला है, उनमें गुस्सा है. एक नवयुवक कहता है, इस बार भोटे नै डालना है. साला रेडियो देकर ठगना चाहता है गरीब को. टोला में फूट पड़ गया है. जो गरीब है उसको नै मिला है, जो मुंहजोर है दू-दू ठो ले आया है. बताइये, रेडियो से क्या होगा. बैटरी खत्म होगा तो बैटरी क्या सरकार का बाप आके भरायेगा?

बहरहाल, बीबीसी के शौकीन अगड़ी जाति के कुछ लोगों की नजर में फिलिप्स के ये रेडियो नाच रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि एकाध महीने में महादलित लोग सौ-दो सौ रु पये में उनके हाथ रेडियो बेच देंगे. घूर के किनारे बैठे लोग चर्चा कर रहे हैं, इ लोग रेडियो लेकर क्या करेगा? पंजाब जाने लगेगा तो बेच के जायेगा. एक-दो लोगों ने अपने मजदूरों को इशारा भी कर दिया है, अगर कोई बेचे तो बता देना. उधर, अपनी दूसरी साड़ी ओढ़ कर आग ताप रही बोकिया सोच रही है, ओढ़ना बड़ा अच्छा था. पिछले साल ही तो साइकिलवाले से 185 रु पया में खरीदा था. अब इस साल ठंडा बिना ओढ़ना के ही काटना पड़ेगा. बिटैया माय जिसको रेडियो मिल गया है, स्टेशन लगा रही है, मगर रेडियो गों-गों करके बंद हो जा रहा है. बगलवाला बूढ़ा कहता है, जिसको नहीं मिला है उसका आह तो लगबे करेगा.. बोकिया मुस्कुराने लगती है.

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