फीनिक्स की तरह है भारतीय लोकतंत्र

– पुष्यमित्र – पंचायतनामा रांची : यूनानी मिथकों में फीनिक्स नाम की एक अनूठी चिड़िया का जिक्र है, माना जाता है कि यह अपनी खाक से फिर से जिंदा हो उठती है. महात्मा गांधी को यह मिथक संभवत: बहुत रोचक लगता था, इसलिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपने आश्रम का नाम ‘फीनिक्स’ ही रखा था. […]
– पुष्यमित्र –
पंचायतनामा
रांची : यूनानी मिथकों में फीनिक्स नाम की एक अनूठी चिड़िया का जिक्र है, माना जाता है कि यह अपनी खाक से फिर से जिंदा हो उठती है. महात्मा गांधी को यह मिथक संभवत: बहुत रोचक लगता था, इसलिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपने आश्रम का नाम ‘फीनिक्स’ ही रखा था.
भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में मुझे हमेशा फीनिक्स का मिथक याद आ जाता है. आजादी के बाद कई ऐसे मौके आये हैं, जब लगने लगा है कि शासन व्यवस्था का पतन हो गया है और लोकतंत्र का अर्थ बाहुबल हो गया है या धनबल. मगर घोर निराशा के बीच से हर बार उम्मीदों भरी सुबह हमारे सामने आ खड़ी होती है.
जब हम मान लेते हैं कि अब लोकतांत्रिक तरीकों से बदलाव मुमकिन नहीं है, तो लोकतंत्र फीनिक्स की तरह खुद को खाक से उठा कर नये रूप में हमारे सामने हाजिर हो जाता है. इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में भी यह हुआ और 15 सालों तक बिहार में चले अंधकार युग के बाद भी. पिछले दो-तीन सालों से हमारा देश एक बार फिर हताशा की दौर में भटक रहा है.
मंत्री सीना ठोंक कर घोटाले कर रहे हैं. बोफोर्स तो इनके सामने अब दूध-भात लगता है. सरकार चलानेवाले कृत्रिम महंगाई पैदा कर जनता की बेचारगी पर अट्टहास कर रहे हैं, लोगों की जरूरत 32 रुपये रोजाना बता रहे हैं, महंगाई का समाधान ढूंढ़ने की जगह कह रहे हैं कि लोग दो सब्जियां खायेंगे तो महंगाई बढ़ेगी ही.
जनता के प्रति यह बेरुखी फ्रांस के राजा लुई 16वें की पत्नी की याद दिलाती है. उसे जब यह बताया गया कि जनता रोटी के लिए तरस रही है, तो उसने कहा-रोटी नहीं है, तो उन्हें केक खाने दो. मौजूदा सरकार जनता द्वारा, जनता के लिए बनी जरूर है, पर यकीनन जनता की नहीं है.
यह लोकतंत्र का घोर पतन है. और दूसरी तरफ हमारे सामने जो विकल्प ‘महागजर्ना’ के जरिये पेश किया जा रहा है, वह खुद संदेह के घेरे में है. धार्मिक रूप से असहिष्णु एक राजनीतिक दल एक ऐसे आदमी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर रहा है जिसके दामन पर दंगों के छींटे हैं.
उस पर से ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का दावा करनेवाली यह पार्टी भी पिछले दस सालों से देश की सबसे पुरानी पार्टी की ही राह पर है. यानी भारतीय जनता को लग रहा था कि आसमान से गिरना है और खजूर पर अटकना है.
मगर इसी पतन के बीच आम आदमी पार्टी (आप) का उदय कहीं न कहीं यह एहसास दिलाता है कि भले ही लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर मोटी खालवाले नेताओं का कब्जा हो गया हो, मगर इस रोग का निदान खुद इसी लोकतंत्र ने तलाश लिया है. दिल्ली के चुनाव में ‘आप’ की जीत, जीत के बाद सत्ता को लेकर उनका विदेह भाव, और अब एक विरोधी दल के समर्थन से सरकार बनाना और वह भी इस ठसक के साथ कि इस भ्रम में न रहें कि आपका समर्थन हमें आपके गुनाहों पर परदा डालने से रोकेगा, सचमुच लोकतंत्र के पुनजर्न्म जैसा ही है.
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