सिर्फ आधा सच कह रहे हैं राहुल!

पिछले कम से कम दो दशकों से भारत के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा यह प्रचारित करने की लगातार कोशिश की गयी कि राजनीति में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है. भ्रष्टाचार एक स्वीकार्य परिघटना है. इससे चुनाव के नतीजे तय नहीं होते. जाहिर है, जब लोकतंत्र को ‘वोट तंत्र’ में सीमित कर दिया गया, तब वोट को […]
पिछले कम से कम दो दशकों से भारत के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा यह प्रचारित करने की लगातार कोशिश की गयी कि राजनीति में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है. भ्रष्टाचार एक स्वीकार्य परिघटना है. इससे चुनाव के नतीजे तय नहीं होते. जाहिर है, जब लोकतंत्र को ‘वोट तंत्र’ में सीमित कर दिया गया, तब वोट को प्रभावित न करनेवाले मसले को तवज्जो के लायक नहीं माना गया.
यही कारण है कि जब 2011 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का आगाज हुआ था, उस वक्त राजनीतिक दलों की पहली प्रतिक्रिया उसे नकारने की थी. सत्तानीत कांग्रेस पार्टी ने तो जन-लोकपाल की मांग को लेकर रामलीला मैदान में उमड़े जन-सैलाब को ‘संघ परिवार द्वारा लायी गयी भाड़े की भीड़’ तक बताने तक की पूरी कोशिश की. 2012 के अंत के आते-आते जन-लोकपाल के आंदोलन के बिखर जाने पर कांग्रेस पार्टी ने निश्चित ही राहत की बड़ी सांस ली होगी. हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में मिली जीत से कांग्रेस का यह यकीन और पुख्ता हुआ कि भ्रष्टाचार कोई बड़ा मसला नहीं है.
लेकिन, 2013 के अंत के आते-आते भ्रष्टाचार का मुद्दा एक बार फिर सेंटर स्टेज पर है. और इसका एहसास कांग्रेस को किसी भी पार्टी से ज्यादा है. चार हिंदीभाषी राज्यों में मिली करारी पराजय से निकलनेवाले संकेत इतने साफ हैं कि उनसे आंखें चुराना संभव नहीं है. यह अकारण नहीं है कि शनिवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उद्योग जगत को अपने संबोधन में यह स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है. राहुल वही कह रहे हैं, जो पूरा देश कह रहा है, लेकिन उनकी यह स्वीकारोक्ति आश्वस्त नहीं करती. क्योंकि राहुल पूरा सच नहीं कह रहे हैं.
वे यूपीए के शासन काल में बनाये गये भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड का जिक्र नहीं कर रहे हैं. न ही इसके लिए अपनी कोई जवाबदेही ही स्वीकार कर रहे हैं. उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि इस समस्या का सामना करने के लिए केंद्र सरकार ने जरूरी इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखायी? ऐसे में राहुल के शब्दों को सुंदर, मगर खोखला ही कहा जा सकता है. अगर वे वाकई इस समस्या के प्रति गंभीर हैं, तो उन्हें इसका सामना शब्दों की जगह कर्मो से करना चाहिए.
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