मकई के खेतों में पनपती वर्णमालाएं

Published at :21 Dec 2013 3:46 AM (IST)
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मकई के खेतों में पनपती वर्णमालाएं

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।। (वरिष्ठ साहित्यकार) समस्तीपुर से रोसड़ा तक हमारी कार सड़क पर फिसलती हुई-सी चली और मैं मन ही मन बिहार सरकार का गुणगान करता जा रहा था. लेकिन रोसड़ा से जैसे ही बटहा गांव की ओर कार मुड़ी, ऊबड़-खाबड़ सड़कों का सिलसिला शुरू हो गया. आधे घंटे की कमरतोड़ यात्रा के बाद […]

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।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)

समस्तीपुर से रोसड़ा तक हमारी कार सड़क पर फिसलती हुई-सी चली और मैं मन ही मन बिहार सरकार का गुणगान करता जा रहा था. लेकिन रोसड़ा से जैसे ही बटहा गांव की ओर कार मुड़ी, ऊबड़-खाबड़ सड़कों का सिलसिला शुरू हो गया. आधे घंटे की कमरतोड़ यात्रा के बाद हम जब बटहा स्कूल पहुंचे. चारों ओर खेतों में गन्ना, मकई, अरहर की लहलहाती फसलें और बीच में स्कूल का दोमंजिला भवनवाला विशाल परिसर. रास्ते में अरसे बाद अल्हुआ-सुथनी की फसल दिखायी पड़ी, आलू की तरह जमीन के नीचे से झांकता अल्हुआ और सुपारी के आकार की दढ़ियल सुथनी.

बारह एकड़ के उस विशाल प्रांगण में घुसा, तो लड़कियां बैडमिंटन और लड़के वॉलीबाल व फुटबॉल खेलते दिखे. एक ओर कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. कुछ दिन पहले इसी स्कूल में ‘रामस्वरूप महतो स्मारक अंतरविद्यालयीय क्रिकेट टूर्नामेंट’ हुआ था. थोड़ा और आगे बढ़े, तो कुछ बच्चे कंप्यूटर पर काम करते दिखे. ग्रामीण छात्र-छात्राओं के छात्रावास में छोटा-सा अतिथिगृह, आधुनिक साज-सज्जा से युक्त था. श्रीमती जेनेट महतो ब्रिटेन के छोटे-से शहर बाथ से हर साल इस स्कूल के वार्षिकोत्सव में भाग लेने पहुंचती हैं, साथ ही इस इलाके के निर्धन ग्रामीणों को आर्थिक सहायता भी देती हैं. उनके प्रयास से ही हर साल इस स्कूल के टॉपर छात्र ब्रिटेन की मुफ्त यात्र कर आते हैं. इस ग्रामीण इलाके के लिए यह आज भी एक सपना है, जिसे 50 साल पहले इसी गांव के एक डॉक्टर ने देखा था. यह स्कूल उसी सपने का साकार रूप है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने गांव-जवार के लोगों को उच्चस्तरीय शिक्षा मामूली शुल्क पर देने का संकल्प लिया था.

डॉ रामस्वरूप महतो इसी बटहा गांव में 17 जनवरी, 1930 को जन्मे और पले-बढ़े. दस वर्ष के हुए तो पिता राम किसुन महतो ने भैंस चराने का काम दे दिया. उन्होंने भैंस चरायी भी, भैंस की पीठ पर लेट कर गीत गाने का आनंद भी लिया; मगर उनके भीतर एक आग थी, जो बराबर उन्हें स्कूल की ओर खींच रही थी. एक दिन उन्होंने तय कर लिया कि स्कूल जाऊंगा. उन्होंने बटहा से रोज आठ किमी पैदल चल कर रोसड़ा हाइ स्कूल से 1948 में मैट्रिक पास किया. तदनंतर साइंस कॉलेज, पटना से आइएससी की. बायोलॉजी में आइएससी के बाद मेडिकल की पढ़ाई करने लगे. उन्होंने 1956 में दरभंगा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस व 1959 में बिहार विश्वविद्यालय से एमएस की डिग्री प्राप्त की. उनकी प्रथम नियुक्ति 1957 में हजारीबाग के पीरटॉड प्रखंड में सरकारी चिकित्सक के रूप में हुई. 1961 में वे रांची मेडिकल कॉलेज में एनाटॉमी व्याख्याता बहाल हुए. 1969 तक वे वहां के रजिस्ट्रार रहे. उनकी शादी 1961 में निर्मला देवी से हुई, जिनसे एक पुत्री विनीता उत्पन्न हुईं.

1970 में वे मात्र तीन हजार रुपये लेकर, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पानी के जहाज से लगभग एक सप्ताह की कठिन यात्र कर इंग्लैंड पहुंचे और एडिनबरा से उन्होंने एफआरसीएस की डिग्री हासिल की. इसके बाद उनकी नियुक्ति ब्रिटेन के ही बाथ शहर के रॉयल हॉस्पीटल में नेत्र चिकित्सक के पद पर हुई, जहां से 1995 में सेवा-निवृत्त हुए. मिस जेनेट उसी अस्पताल में नर्स का काम करती थीं. दोनों में प्रेम हुआ और दोनों के एकाकीपन ने उन्हें वैवाहिक सूत्र में बांध दिया. उनकी संतानें ब्रिटेन में ही कार्यरत हैं और कभी-कभी बटहा आती भी हैं. अपने गांव से डॉक्टर महतो को लगाव था और वे समय-समय पर जेनेट के साथ यहां आते थे. अपने बचपन की कहानी वे बाथ में भी सहकर्मी चिकित्सकों और मित्रों को बताते थे. उन्हें ‘बफैलो ब्वॉय’ कहलाने में कोई परेशानी नहीं होती थी. इसीलिए जब वे रिटायर हुए, तो सहकर्मियों ने उन्हें धातु-निर्मित भैंस चरवाहे की विशाल मूर्ति भेंट की.

सोचिए, एक आदमी जो 40 साल तक विदेश में भौतिक सुविधाओं के बीच रहा हो, अचानक अपने उस गांव में स्थायी रूप से रहने की सोचे, जहां अब भी लोग शौच जाने को जलाशय की ओर रुख करते हैं, कितना बड़ा अजूबा है. रिटायर होने के बाद वे अपने गांव आये और सारी संपत्ति अपने पिता के नाम से ट्रस्ट बना कर उसे सौंप दी. इस ट्रस्ट के माध्यम से ही उन्होंने गांव में अपनी मां सुंदरी देवी के नाम पर सरस्वती विद्या मंदिर स्थापित किया. डॉ महतो को लोगों ने सुझाव दिया कि वे स्कूल के बजाय अस्पताल या कोई संस्था खोलें, क्योंकि उसमें ज्यादा लाभ है, मगर उनका कहना था कि अच्छे स्कूल ही प्रतिभाओं की नर्सरी होते हैं, इसलिए हर गांव में अच्छे स्कूल होने चाहिए. वे देशभक्त भी थे और समाज सुधारक भी. उन्होंने अपने छात्रवास के रसोईघर में सारे कर्मचारी चुन-चुन कर उन जातियों के रखे, जिनका छुआ पानी पिछड़ी जातियों के लोग भी नहीं पीते थे. वे निर्धन छात्रों को नि:शुल्क शिक्षा तो देते ही थे, उन्हें आइआइटी आदि की पढ़ाई करने के लिए अपनी ओर से आर्थिक सहायता भी देते थे. जब विद्यालय के वार्षिकोत्सव में गांव के अनगढ़ छात्र-छात्राओं को प्रभावी ढंग से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए मैंने देखा, तो मेरी आंखों में आंसू छलछला गये, क्योंकि मेरे समय में इस इलाके में इतने सुविधा-संपन्न ग्रामीण स्कूल नहीं थे.

जब यह स्कूल बन रहा था, तब इसकी चहारदीवारी के निर्माण से एक सड़क अवरुद्ध हो रही थी. चूंकि यह स्कूल आरएसएस के एक शैक्षिक संगठन के अंतर्गत था, इसलिए एक कम्युनिस्ट नेता लालन सिंह ने चहारदीवारी को लोगों से कह कर तोड़वा दिया. डॉ महतो ने उसे आवास पर सादर बुलाया. फिर, दोनों परिवारों के बीच गहरे संबंधों की लंबी चर्चा करने के बाद पूछा, आपने दीवार क्यों तोड़वायी? उसने कहा, इससे सड़क अवरुद्ध होती थी. डॉक्टर साहब- आपने पहले मुङो क्यों नहीं बताया? अब क्या होना चाहिए? अगला सवाल था डॉ साहब का. वह बोला- आप फिर से दीवार बनवा लें और मैं आपसे पूछ कर तोड़वा दूंगा. इस पर वे ठठा कर हंसे. उसने अपनी दुविधा बतायी- यह स्कूल विद्या भारती द्वारा संचालित है और मैं ठहरा घोर कम्युनिस्ट! इस पर डॉ महतो ने जो जवाब दिया, वह उनके वास्तविक चरित्र को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि यहां विचारधारा का प्रश्न गौण है और विद्यालय के विकास का प्रश्न मुख्य. जब सभी लोग मिल कर एक दिशा में अग्रसर होंगे, तो मतभेद कैसा? स्कूल के वर्तमान अध्यक्ष डॉ एनके सिंह बताते हैं कि डॉ महतो का देहांत तो 2006 में हो गया, मगर सिंह आज भी विद्यालय के ट्रस्टी हैं. बटहा ही नहीं, इसके आसपास के सारे गांव यदि डॉ महतो को पूजते हैं, तो इसलिए कि आज भी उनके मकई के खेत में वर्णमालाओं की फसलें लहलहा रही हैं.

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