राहुल-मोदी पर भारी केजरीवाल की धार

Published at :20 Dec 2013 4:03 AM (IST)
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राहुल-मोदी पर भारी केजरीवाल की धार

।। पुण्य प्रसून बाजपेयी।। (वरिष्ठ पत्रकार) दिल्ली का 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय हो या 10 अशोक रोड यानी भाजपा मुख्यालय, दोनों ही जगह 8 दिसंबर को एक अजीबो-गरीब खामोशी थी. शाम में दोनों मुख्यालयों में 2014 के पीएम पद के दावेदार मीडिया के सामने आये. हाथों को हवा में लहराने की जगह उन्हें […]

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।। पुण्य प्रसून बाजपेयी।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

दिल्ली का 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय हो या 10 अशोक रोड यानी भाजपा मुख्यालय, दोनों ही जगह 8 दिसंबर को एक अजीबो-गरीब खामोशी थी. शाम में दोनों मुख्यालयों में 2014 के पीएम पद के दावेदार मीडिया के सामने आये. हाथों को हवा में लहराने की जगह उन्हें पीछे बांध कर राहुल गांधी ने जिस खामोशी से चुनावी हार मानी और नरेंद्र मोदी ने ढोल-नगाड़ों के बीच भी जिस शालीनता से हाथ जोड़ कर अभिवादन भर किया, उसने पहली बार यह संकेत तो दे दिये कि चुनाव परिणाम ने दोनों ही राष्ट्रीय दलों को हिला दिया है. क्योंकि देश का राजनीतिक मिजाज पहली बार एक ऐसे विकल्प को मान्यता देने को तैयार है, जो पारंपरिक राजनीति से इतर हो. दिल्ली के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस और भाजपा को डरा दिया है. यही वजह रही कि 8 दिसंबर के बाद बीते दस दिनों में राहुल आधे दर्जन से ज्यादा बार मीडिया से रूबरू हुए. इन दस दिनों में मोदी ने सिर्फ एक रैली को संबोधित किया, जिसमें दिल्ली के चुनाव परिणाम पर खामोशी बरती.

केजरीवाल के राजनीतिक प्रयोग की सफलता ने राहुल गांधी को कांग्रेस के भीतर ‘केजरीवाल’ बनने पर मजबूर कर दिया है. उधर, मोदी भाजपा के कांग्रेस विरोधी राजनीतिक प्रयोग से आगे नहीं निकल पा रहे हैं. मुलायम सिंह यादव को केजरीवाल की सफलता पानी के बुलबुले की तरह लग रही है, तो लालू प्रसाद को केजरीवाल बहुरुपिया लग रहे हैं. तो क्या दिल्ली के चुनावी नतीजे के बाद एक झटके में ‘केजरीवाल वर्सेस ऑल’ के हालात राजनीतिक तौर पर देश में उभर गये हैं? वैचारिक विरोध होने के बावजूद कांग्रेस और भाजपा केजरीवाल को धराशायी करनेवाले मुद्दों पर एक होने से नहीं कतरा रहे हैं. लोकपाल का 45 बरस बाद संसद में पास होना क्या इसी का प्रतीक है?

यह सवाल बड़ा है, क्योंकि लोकपाल पर कांग्रेस और भाजपा में तब तक सहमति नहीं बनी, जब तक कि जनलोकपाल का सवाल उठा कर आंदोलन करनेवाली आम आदमी पार्टी को चुनावी राजनीति में सफलता नहीं मिली. याद कीजिए, यूपीए सरकार के साथ खड़ी सपा हमेशा लोकपाल का विरोध करती रही है. सरकार चलाते रहने के लिए कांग्रेस ने लोकपाल पर कभी वह हिम्मत नहीं दिखायी, जो दिल्ली के चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल गांधी से लेकर समूची कांग्रेस ने बोल-बोल कर दिखा दिये, जबकि सपा आज भी लोकपाल का विरोध कर रही है. तो पहला सवाल है कि क्या मुलायम के समर्थन पर आम आदमी पार्टी की चुनावी सफलता अब कांग्रेस को कहीं ज्यादा खतरनाक लगने लगी है? दूसरा सवाल, तो क्या यह माना जाये कि लोकपाल की तर्ज पर ही अगर देश में महिला आरक्षण को लेकर भी कोई आंदोलन खड़ा हो और फिर वही आंदोलन राजनीतिक पार्टी में तब्दील होकर चुनावी राजनीति में बाजी मार ले, तो महिला आरक्षण भी संसद में पास हो जायेगा? यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि महिला आरक्षण का विरोध करनेवाले भी वही मुलायम और शरद सरीखे नेता हैं. यानी केजरीवाल ने पहली बार उस राजनीतिक व्यवस्था में सेंध लगा दी है, जो सत्ता के जोड़-तोड़ में ही आम जनता को उलझाये रखती है और मुद्दों के नाम पर नूरा-कुश्ती सिर्फ इसलिए करती है, ताकि राजनीतिक दलों की उपयोगिता बनी रहे. मंडल-कमंडल के बाद पहली बार देश का आम आदमी एक ऐसी राजनीति को देख रहा है, जहां उससे जुड़े मुद्दे उसी के जरिये चुनावी जीत या हार पैदा कर उसे ही सत्ता में पहुंचा रहे हैं!

अब 2014 को लेकर चल रही राहुल या कांग्रेस की रणनीति हो या भाजपा पर भारी मोदी; या फिर मुलायम सिंह और वामपंथियों का तीसरे मोरचे का सपना; अगर मौजूदा परिस्थिति वाकई तेजी पकड़ ले गयी, तो 2014 के लोकसभा चुनाव में सब कुछ धरा का धरा रह सकता है. देखना है कि संसद में पास लोकपाल क्या वाकई आम लोगों के जेहन में सत्ताधारियों को लेकर बढ़े आक्रोश को थाम सकेगा? संसद के गलियारे में मना लोकपाल का जश्न तो यही एहसास कराता है, लेकिन जमीनी सच क्या है? यूपीए-2 के भ्रष्टाचार के आईने में अगर संसद के जश्न को देखें, तो 2जी स्पेक्ट्रम, कोलगेट और कॉमनवेल्थ घोटाले, ये तीन धब्बे यूपीए-2 की खास पहचान हैं. इसके कटघरे में पहली बार सरकार, नौकरशाह और कॉरपोरेट, तीनों आये. सरकार पर निगरानी रखनेवाले मीडिया के नामचीन चेहरे भी शक के दायरे में आये. पहली बार हर स्तर पर यह सवाल उठा कि रास्ता निकलेगा कैसे, क्योंकि देश की सबसे बड़ी जांच एंजेसी भी इसी दौर में ‘सरकारी पिंजरे में कैद तोता’ करार दे दी गयी. हर किसी के सामने दो सवाल सबसे बड़े थे. अगर पीएम के दामन पर दाग लगे, तो उसकी जांच कौन करेगा? जांच करनेवाली एजेंसी सीबीआइ अगर सरकार के अधीन है, तो वह अपने ही बॉस पीएम की जांच का मौका आने पर क्या करेगी? जैसे ही सीबीआइ पीएम से पूछताछ करेगी, नैतिकता के आधार पर पीएम से इस्तीफे की मांग सबसे महत्वपूर्ण हो जायेगी. ध्यान दें, तो 2जी और कोलगेट, दोनों घोटालों की जांच सीबीआइ कर रही है, पर यह जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है. इन घोटालों में ही नहीं, सीबीआइ जांच में भी सरकार की भूमिका को लेकर सवाल उठे. इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कमान अपने हाथ ले ली.

लोकपाल बिल में पीएम पर लगनेवाले आरोपों को खास प्रावधान के तहत जांच के दायरे में रखा गया है और सीबीआइ को भी सिर्फ लोकपाल के किसी जांच के दौरान ही लोकपाल के अधीन रखा गया है. यानी पीएम के लिए सामान्य कटघरा नहीं है और सीबीआइ भी सामान्य परिस्थिति में स्वतंत्र है. सबसे महत्वपूर्ण है कि लोकपाल हो या राज्यों में लोकायुक्त, दोनों राजनेता खुद नहीं बन पायेंगे, लेकिन दोनों की नियुक्ति में राजनेताओं की ही सबसे बड़ी भूमिका होगी. लोकपाल को हटाने की शुरुआत भी उसी संसद से होगी, जिसमें 242 सांसद दागी हैं. 100 सांसद लोकपाल के खिलाफ लिख कर देंगे, तो ही सुप्रीम कोर्ट जांच करेगा. जांच में अगर लोकपाल का कोई सदस्य दोषी पाया गया, तो सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति से सस्पेंड करने की गुहार लगायेगा. इसी तर्ज पर लोकायुक्त की नियुक्ति से लेकर सस्पेंड कराने तक में उसी विधानसभा की भूमिका बड़ी होगी, जिसमें दागी नेताओं की भरमार है.

दरअसल, राहुल हो या मोदी, या फिर जातीय राजनीति के आधार पर टिके क्षत्रप, सभी केजरीवाल से घबराये हुए हैं, क्योंकि केजरीवाल जनता की भागेदारी से आगे निकल कर आम आदमी को ही सत्ताधारी बनाने का रास्ता दिखा रहे हैं. हालांकि सियासत अब भी तिकड़मों के सहारे खुद को पाक-साफ बताने-बनाने पर चल रही है.

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