भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता

Published at :20 Dec 2013 3:52 AM (IST)
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भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता

।। लालकृष्ण आडवाणी ।। (वरिष्ठ भाजपा नेता) वर्ष 2013 समाप्ति की ओर है. एक महत्वपूर्ण चुनावी लड़ाई हाल ही में समाप्त हुई है. अब एक निर्णायक लड़ाई आनेवाले वर्ष में लड़नी है. आगामी वर्ष की मध्यावधि समाप्त होने से पहले ही सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के शासन का भविष्य तय हो जायेगा. समाचारपत्रों की […]

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।। लालकृष्ण आडवाणी ।।

(वरिष्ठ भाजपा नेता)

वर्ष 2013 समाप्ति की ओर है. एक महत्वपूर्ण चुनावी लड़ाई हाल ही में समाप्त हुई है. अब एक निर्णायक लड़ाई आनेवाले वर्ष में लड़नी है. आगामी वर्ष की मध्यावधि समाप्त होने से पहले ही सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के शासन का भविष्य तय हो जायेगा. समाचारपत्रों की सुर्खियों ने विगत विधानसभा चुनावों को ‘कांग्रेस का सफाया’ के रूप में वर्णित किया हैं. संडे टाइम्स (15 दिसंबर, 2013) में एमजे अकबर के एक लेख के अंतिम तीन वाक्य इस प्रकार हैं- ‘जब प्रत्येक भारतीय गुस्से में है, तब भारत गुस्से से उबल रहा है. 2013 में हमें एक झलक देखने को मिली है. 2014 में हमें क्रोध का पूर्ण स्वरूप देखने को मिलेगा.’

आगामी चुनावी संघर्ष में कांग्रेस का भविष्य कोई ज्यादा अलग नहीं होगा. पिछले विधानसभा चुनावों तक, कांग्रेस को चेतावनी देते हुए मैं हमेशा आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनावों की याद दिलाते हुए कहता था कि एक जीवंत लोकतंत्र में प्रचंड क्रोध राजनीतिक व्यवस्था में सर्वाधिक अपेक्षित जवाबदेही लाने के लिए सर्वाधिक प्रभावी उपकरण बन सकता है. भारत के राजनीतिक इतिहास में 1977 के संसदीय चुनाव ने कांग्रेस को सत्ताच्युत कर दिया था. तीस वर्षो तक पार्टी अजेय सी बनी रही. परंतु 1975 की शुरुआत में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध एक चुनावी याचिका स्वीकार करते हुए न केवल लोकसभा के लिए उनका चुनाव रद्द कर दिया, बल्कि छह वर्ष के लिए संसद का चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य करार दिया था. स्वाभाविक रूप से विपक्ष ने उनका त्यागपत्र मांगा. इंदिरा गांधी का जवाब था- अनुच्छेद 352 लागू कर आपातकाल थोपना.

इसके बाद अनेक ऐसे कदम उठाये गये, जिनसे भारतीय लोकतंत्र समाप्ति के कगार पर पहुंच गया. एक लाख से ज्यादा विरोधियों, जिनमें जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर जैसे देशभक्तों सहित 300 से ज्यादा मीडियाकर्मियों को आपातकाल के दौरान जेलों में डाल दिया गया. मीडिया पर अनेकों प्रतिबंध थोप दिये गये. लेकिन 1975-77 के आपातकाल में उस नाजुक संकट के दौरान भी यदि भारतीय लोकतंत्र जीवित बचा रहा, तो इसके दो कारण थे. पहला, लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा उन राजनीतिक दलों को साथ लेकर किया गया साहसी संघर्ष, जिन्होंने आपातकाल से पूर्व ही उनके द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध छेड़े गये अभियान में उनके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था. दूसरा, 1977 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं द्वारा विरोध में की गयी रिकार्डतोड़ मतदान. उस चुनाव में, उत्तर भारतीय राज्यों की कुल 236 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस पार्टी अपने खाते में केवल दो ही सीटें बचा सकी- एक राजस्थान में और दूसरी मध्य प्रदेश में. वहीं उत्तर प्रदेश में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं चुनाव हार गयीं.

मैं मानता हूं कि हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की आपातकाल के बाद से दूसरी सबसे विनाशकारी पराजय हुई है, बावजूद इसके कि मतदाताओं को खरीदने के तमाम प्रयास किये गये. विशेष रूप से राजस्थान में, मतदाताओं को रिझाने के लिए चुनावों की पूर्व संध्या पर अनेक फैसले किये गये. भ्रष्टाचार, महंगाई, कालेधन इत्यादि संबंधी अपने एक पूर्ववर्ती ब्लॉग में मैंने टिप्पणी की थी कि 2014 के लोकसभा चुनावों में यदि कांग्रेस दो के आंकड़े तक सिमट जाये, तो देश को आश्चर्य नहीं करना चाहिए.

भ्रष्टाचार, महंगाई और कालाधन : अपने जीवन में मैंने अनेक यात्रएं की हैं. इस कड़ी में मेरी अंतिम यात्र सन् 2011 में हुई थी. इसका नाम था ‘जनचेतना यात्रा’. चालीस दिन तक चली यह यात्र भ्रष्टाचार, महंगाई, विशेष रूप से खाद्यान्न महंगाई और कालेधन के विरुद्ध थी. हमारी मांग थी कि भ्रष्टाचार रोका जाये, कीमतें कम हों, विशेष रूप से खाद्यान्न वस्तुओं की कीमतें घटें और विदेशों के टैक्स हेवंस में ले जाये गये धन को भारत में वापस लाया जाये. मुङो स्वयं यह देख कर आश्चर्य हुआ कि मेरी इस यात्रा को जितना समर्थन मिला, वह पूर्व में निकाली गयी अन्य यात्राओं से कहीं अधिक था.

देश में चले इस अभियान के फलस्वरूप भारत सरकार ने कालेधन के मुद्दे पर संसद में एक श्वेतपत्र प्रस्तुत किया, लेकिन उसके बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये. एक पैसा भी वापस नहीं लाया जा सका! एक हालिया समाचार में अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘ग्लोबल फायनेंशियल इंटीगट्री’(जीएफआइ) के हवाले से बताया गया है, 2011 में चार लाख करोड़ रुपये का कालाधन अवैध रूप से भारत से बाहर ले जाया गया. यह पिछले वर्ष की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक था!

(ब्लॉग से साभार)

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