जनजातीय महत्व का टूसु पर्व

अगहन संक्रांति की शाम से ही झारखंड एवं सीमावर्ती बंगाल के गांवों में एक अनोखी चहल पहल की गुनगुनाहट सुनायी पड़ने लगी है. खलिहानों में धान के बीड़ों के ढेर लग गये हैं. धान की जननी ‘डिनि’ माता का आगमन खेत से खलिहान में इसी दिन होता है. इसी डिनि को सदियों से गांव की […]
अगहन संक्रांति की शाम से ही झारखंड एवं सीमावर्ती बंगाल के गांवों में एक अनोखी चहल पहल की गुनगुनाहट सुनायी पड़ने लगी है. खलिहानों में धान के बीड़ों के ढेर लग गये हैं. धान की जननी ‘डिनि’ माता का आगमन खेत से खलिहान में इसी दिन होता है.
इसी डिनि को सदियों से गांव की कुमारी बालाएं टूसु (संगी) नाम से बुलाती आयी हैं और इसकी आराधना के गीत गुनगुनाती आयी हैं : टूसु-टूसु करिय हामरा टूसु नायखि मांय घारे गो; कनेटूसु के लेये गेलैय फुलेक माला देये गौ.
आज टूसु घर आयी है. अब इसे एक मास तक घर में ये बालाएं दुलारेंगी, संवारेंगी और नाना प्रकार के गीतों से इसका मन तरंगित करती रहेंगी. एक मास तक टूसु गीतों से झारखंड, बंगाल का यह क्षेत्र गमगमाता रहेगा.
सारे देश में सिर्फ यही क्षेत्र है जहां पूर्व-वैदिक कालीन अनार्य परंपराएं परबों और गीतों के रूप में बची हुई हैं. भारत में शायद ही कोई ऐसा पर्व होगा जिसे सिर्फ कुंवारी कन्याएं ही सामूहिक रूप से मनाती हैं.
करम और टूसु ऐसे ही विशेष पर्व हैं, जिन्हें झारखंडी लोकपर्व का दर्जा प्राप्त है. टूसु एकमात्र प्रकृति पर्व है जो एक मास तक चलता है. इस पर्व के आविर्भाव के पीछे इधर बहुत सी कथाएं प्रचलित हो गयी हैं. टूसु किसी राजा की बेटी न होकर प्रकृति साधक चासा-किसान की बेटी हैं और प्राचीन काल से ही इसकी इसी रूप में आराधना की जाती रही है.
यह हमें मध्यम मार्ग पर चलने की सलाह देती आयी हैं. एक सडपें दुइ सडपे तीन सडपें लक चलेइ; हामर टूसु मांझे चलेइ बिन बास.
महादेव महतो, ई-मेल से
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