इस बहस में मौलाना आजाद को भी पढ़ें

Published at :10 Nov 2013 3:45 AM (IST)
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इस बहस में मौलाना आजाद को भी पढ़ें

।। राजेंद्र तिवारी।।(कारपोरेट संपादक, प्रभात खबर)सरदार पटेल को लेकर पूरे देश में बहस जारी है. दोनों ओर से बहुत सारी बातें बतायी जा रही हैं, फिर भी बहुत कुछ छूट गया है. पिछले रविवार को मैंने मौलाना अबुल कलाम आजाद की पुस्तक इंडिया विन्स फ्रीडम से कुछ तथ्य रखे थे. इस क्र म को जारी […]

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।। राजेंद्र तिवारी।।
(कारपोरेट संपादक, प्रभात खबर)
सरदार पटेल को लेकर पूरे देश में बहस जारी है. दोनों ओर से बहुत सारी बातें बतायी जा रही हैं, फिर भी बहुत कुछ छूट गया है. पिछले रविवार को मैंने मौलाना अबुल कलाम आजाद की पुस्तक इंडिया विन्स फ्रीडम से कुछ तथ्य रखे थे. इस क्र म को जारी रखते हुए इसी पुस्तक से कुछ और बातें शेयर कर रहा हूं. मौलाना आजाद आजादी के पहले के सबसे महत्वपूर्ण वर्षो 1939 से 1945 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और गांधी जी के बाद वे पार्टी के तीन सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल थे. इस किताब में उन्होंने लिखा है कि पार्टी के कई नेता मुझेही 1946 में अध्यक्ष बनाना चाहते थे और उन्होंने जब मुझ पर दबाव डाला, तो मैंने गांधीजी से सलाह ली.

गांधीजी ने कहा कि इतने सालों तक अध्यक्ष रहने के बाद अब आपको अलग हट जाना चाहिए. मौलाना आजाद नि:संदेह उन कांग्रेस नेताओं में शामिल थे जिन्होंने आखिर तक विभाजन का विरोध किया. विभाजन टालने के लिए सत्ता हस्तांतरण दो साल टालने का प्रस्ताव भी रखा जिसे नहीं माना गया. मौलाना आजाद का मानना था कि इस दौरान मुसलिम लीग को समझाया जा सकता है. वक्त के साथ वह नरम पड़ जायेगी. उनका ख्याल था कि पाकिस्तान का नारा मोहम्मद अली जिन्ना के लिए राजनीतिक मोलभाव का लीवर मात्र था और जिन्ना यह अच्छी तरह समझते भी थे. लेकिन कुछ कांग्रेस नेताओं की वजह से जिन्ना का यह लीवर मजबूत हो गया और इसकी कीमत देश को विभाजन के रूप में चुकानी पड़ी.

1946 में जवाहरलाल कांग्रेस के अध्यक्ष बने. उससे पहले मेरी अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यसमिति ने कैबिनेट मिशन को स्वीकार करने की घोषणा की थी. इसे आल इंडिया कांग्रेस समिति की मंजूरी मिलनी बाकी थी. वह भी मिल गयी. जिन्ना भी इस प्लान को स्वीकार करने की घोषणा कर चुके थे. इसके बाद घटनाक्रम कुछ ऐसा चला कि इतिहास बदल गया. चूक जवाहरलाल से हुई. 10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल ने मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस संबोधित की और चौंकाने वाला बयान दे दिया. कुछ पत्रकारों ने उनसे पूछा कि एआइसीसी से कैबिनेट मिशन प्लान मंजूर होने के बाद क्या यह समझा जाना चाहिए कि कांग्रेस ने इसे संपूर्णता में स्वीकार कर लिया है जिसमें अंतरिम सरकार की संरचना भी शामिल है? इस पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस संविधान सभा में उन्मुक्त रूप से जायेगी और उत्पन्न होनेवाली परिस्थितियों से स्वतंत्र रूप से निबटेगी.

इस पर पत्रकार ने पूछा कि क्या कैबिनेट मिशन प्लान में संशोधन भी किया जा सकता है? जवाहरलाल ने जवाब दिया कि कांग्रेस सिर्फ संविधान सभा में शामिल होने पर सहमत हुई है और कांग्रेस कैबिनेट मिशन प्लान में वे सभी संशोधन व परिवर्तन करने को स्वतंत्र है जो उसे जरूरी नजर आयेंगे. मौलाना आजाद लिखते हैं कि जिन्ना ने दबाव में आकर इस प्लान को मंजूरी दी थी लिहाजा वे असहज थे ही और इस प्रेस कांफ्रेंस से उनको मौका मिल गया. जिन्ना ने तुरंत बयान जारी किया कि कांग्रेस अध्यक्ष का ताजा बयान मौजूदा स्थितियों पर पुनर्दृष्टि की जरूरत पैदा कर रहा है. 27 जुलाई को मुसलिम लीग काउंसिल की बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया कि अब पाकिस्तान के अलावा कोई चारा नहीं है. इसके बाद कांग्रेस ने स्थितियां संभालने की भरसक कोशिश की, लेकिन जिन्ना नहीं माने. यहां पर मौलाना आजाद मानते हैं कि उनसे दो गलतियां हुईं जिनका एहसास उन्हें बाद में हुआ. पहली गलती, 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए अपनी उम्मीदवारी न पेश करना और दूसरी गलती, पटेल के नाम की जगह जवाहरलाल का नाम नये अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित करना.

अपनी पुस्तक में जब वे विभाजन की आहट का जिक्र करते हैं, तो विभाजन के लिए मुख्य रूप से पटेल को जिम्मेदार ठहराते हैं. वह लिखते हैं- इट मस्ट बी प्लेस्ड ऑन रिकॉर्ड दैट द मैन इन इंडिया हू फस्र्ट फेल फॉर लार्ड माउंटबेटेंस आइडिया (ऑफ पार्टिशन) वाज सरदार पटेल. टिल परहैप्स द वेरी एंड पाकिस्तान वाज फॉर जिन्ना ए बारगेनिंग काउंटर, बट इन फाइटिंग फॉर पाकिस्तान, ही हैड ओवररीच्ड हिमसेल्फ. वह बताते हैं कि कैसे पटेल के बाद माउंटबेटेन ने जवाहरलाल को भी मना लिया. उन्होंने लिखा है कि मैंने अपने इन दोनों सहयोगियों को मनाने की कोशिश की कि वे कोई अंतिम कदम न उठायें. लेकिन मैंने देखा कि पटेल विभाजन के पक्ष में इतना ज्यादा हैं कि वे कोई और पक्ष सुनना ही नहीं चाहते. मैंने दो घंटे तक उनसे बहस की और कहा कि यदि हम विभाजन स्वीकार करते हैं तो भारत के लिए स्थायी रूप से एक नासूर पैदा कर देंगे. लेकिन मुझे पटेल का जवाब सुन कर बहुत कष्ट हुआ. पटेल ने कहा कि हम पसंद करें या न करें, भारत में दो राष्ट्र हैं. पटेल पूरी तरह से मानते थे कि हिंदू व मुसलिम एक राष्ट्र में समाहित नहीं किये जा सकते. विभाजन से ही हम यह झगड़ा खत्म कर सकते हैं. अब मैं जवाहरलाल की ओर मुखातिब हुआ. उन्होंने पटेल की तरह विभाजन की तरफदारी तो नहीं की, लेकिन मुझसे हताशा भरे शब्दों में पूछा कि आप ही बताइए, फिर विकल्प क्या है. जवाहरलाल विभाजन को सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं मानते थे, लेकिन यह कहते थे मौजूदा हालात दुर्भाग्यपूर्ण रूप से हमें विभाजन की ओर ले जा रहे हैं.

कुछ दिन बाद जवाहरलाल मुझसे मिलने आये और लंबी-चौड़ी भूमिका बांधने लगे कि हमें सदिच्छा की जगह वास्तविकता का सामना करना चाहिए. अंत में वे बोले कि मुङो (मौलाना को) भी विभाजन का विरोध छोड़ देना चाहिए. मैंने उनसे कहा कि मैं तुम्हारे नजरिये का समर्थन नहीं कर सकता. मुझे साफ लग रहा था कि एक के बाद एक गलत फैसले होते जा रहे हैं. पटेल के बाद जवाहरलाल भी विभाजन के पैरोकार बन गये थे और मेरे लिए गांधीजी ही एकमात्र आशा की किरण बचे थे. मैं उनसे मिला. गांधीजी ने कहा कि विभाजन की चुनौती सामने है. वल्लभभाई और यहां तक कि जवाहरलाल ने भी इस चुनौती के सामने समर्पण कर दिया है. तुम क्या करोगे? मेरे साथ खड़े होगे या तुम भी बदल गये हो? मैंने कहा कि मैं विभाजन का विरोधी हूं और रहूंगा. मेरा विरोध दिन-ब-दिन और मजबूत होता जा रहा है. मेरे लिए अब आप ही आशा की किरण हैं. मुझे आशंका है कि भारत खत्म हो जायेगा. इस पर गांधीजी ने कहा कि यदि कांग्रेस विभाजन स्वीकार करने की इच्छा रखती है तो यह काम मेरी लाश पर ही होगा. लेकिन बाद में सरदार पटेल ने गांधीजी को राजी कर लिया. 2 अप्रैल को गांधीजी माउंटबेटेन से मिलने गये और उसके बाद सरदार पटेल गांधीजी से मिले. उनके बीच दो घंटे बात हुई. मुझे नहीं पता कि इन दो घंटों में क्या घटा, लेकिन जब मैं गांधीजी से दोबारा मिला, मुझे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा कि गांधीजी बदल गये थे. उन्होंने पटेल वाले तर्क ही दोहराये. दो घंटे तक मैंने उनसे विनती की, लेकिन गांधीजी पर कोई असर न हुआ. मैंने निराशा में कहा कि अब आप भी बदल गये. भारत को बरबादी से अब कोई नहीं बचा सकता.
(अगले रविवार को भी जारी)

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