रावण नहीं, दुर्योधन का दहन हो

Published at :26 Oct 2013 2:58 AM (IST)
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रावण नहीं, दुर्योधन का दहन हो

हमारे जीवन में रामायण और महाभारत दो महाग्रंथ बहुत महत्व के हैं. जब भी हम विचलित होते हैं तो इन ग्रंथों का ही सहारा मिलता है. रामायण से कर्तव्य और संस्कारों की शिक्षा मिलती है, जबकि महाभारत हमें धर्म और कर्म की शिक्षा देता है. माध्यम कुछ सच्ची एवं कुछ काल्पनिक कथा-कहानियां हैं. शुरू कहीं […]

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हमारे जीवन में रामायण और महाभारत दो महाग्रंथ बहुत महत्व के हैं. जब भी हम विचलित होते हैं तो इन ग्रंथों का ही सहारा मिलता है. रामायण से कर्तव्य और संस्कारों की शिक्षा मिलती है, जबकि महाभारत हमें धर्म और कर्म की शिक्षा देता है. माध्यम कुछ सच्ची एवं कुछ काल्पनिक कथा-कहानियां हैं. शुरू कहीं से करें, अंत बुराई के विनाश से ही होता है.

रामायण में बुराई का प्रतीक रावण है, तो महाभारत में यह भूमिका दुर्योधन को दी गयी है. मालूम नहीं यह परंपरा कब से चली आ रही है, मगर दशहरे का उत्सव तभी पूरा होता है जब रावण रूपी बुराई का सबंधु-बांधव दहन कर लिया जाता है. उसके बाद श्रीराम अपने नगर अयोध्या लौटते हैं, जिसकी खुशी में दीपों का त्योहार दीपावली मनायी जाती है. लेकिन आज के सामाजिक और राजनैतिक परिवेश में रावण दहन महत्वहीन है, फिर भी परंपराओं का निर्वहन होता है.

कथा के चरित्र और चारित्रिक विशेषताओं पर ध्यान दें, तो दुर्योधन इस युग का सही प्रतिनिधित्व करता है. जिसमें ईष्र्या है, द्वेष है, लालच है, छल है, कपट है और नारी उत्पीड़न की लालसा है. कहानी के विस्तार को छोड़ दें तो सीता की अग्निपरीक्षा से रावण का अपराध भी क्षम्य हो जाता है, जबकि दुर्योधन अभी भी सिर ऊंचा कर घूमता है और हमारा समाज उसे बुराई का प्रतीक मानना ही नहीं चाहता है. ‘दहशतगर्दी’, ‘जुआ खेलना’ और ‘सरेआम नारी को निर्वस्त्र’ करने जैसे जघन्य अपराध करनेवाले बुराई के प्रतीक नहीं माने जाते? शायद तभी दशहरे पर दशहरे बीतते जा रहे हैं और हम दीपावलियां मनाते आ रहे हैं, लेकिन रामराज्य अब तक कायम नहीं हो पाया है. तो परंपराएं बदलनी ही चाहिए.
एमके मिश्र, रांची

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