भारत-पाकिस्तान : वॉर छोड़ न यार

Published at :24 Oct 2013 2:46 AM (IST)
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भारत-पाकिस्तान : वॉर छोड़ न यार

।।प्रमोद जोशी।।(वरिष्ठ पत्रकार)जम्मू-कश्मीर में गोलीबारी अब चिंताजनक स्थिति में पहुंच गयी है. पाकिस्तानी सेना ने बीते दिन लाउडस्पीकर पर घोषणा कर केरन सेक्टर के एक आदर्श गांव में कम्युनिटी हॉल का निर्माण रुकवा दिया. सन् 2003 में दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा के आसपास के गांवों में जीने का माहौल बनाने का समझौता किया था, […]

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।।प्रमोद जोशी।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
जम्मू-कश्मीर में गोलीबारी अब चिंताजनक स्थिति में पहुंच गयी है. पाकिस्तानी सेना ने बीते दिन लाउडस्पीकर पर घोषणा कर केरन सेक्टर के एक आदर्श गांव में कम्युनिटी हॉल का निर्माण रुकवा दिया. सन् 2003 में दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा के आसपास के गांवों में जीने का माहौल बनाने का समझौता किया था, पर लगता है वह खत्म हो रहा है. पिछले दस महीनों से यहां कड़वाहट बढ़ रही है. जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अब पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहते हैं. उन्होंने कहा है कि यदि पाक लाइन ऑफ कंट्रोल पर संघर्ष विराम का उल्लंघन जारी रखता है, तो केंद्र सरकार को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए. विकल्प क्या हैं? उधर, नवाज शरीफ ने अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग कर घाव फिर से हरे कर दिये हैं. नवाज रिश्तों को बेहतर बनाने की बात करते हैं, लेकिन भारत को ‘सबसे तरजीही मुल्क’ का दर्जा देने भर को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि इस मामले पर बात भारत के अगले चुनाव के बाद होगी. क्या मौजूदा तनाव का रिश्ता लोकसभा चुनाव से भी जुड़ा है? क्या पाकिस्तान को लगता है कि भारत में सत्ता परिवर्तन होनेवाला है? यदि सत्ता परिवर्तन हो भी गया, तो क्या भारतीय विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव आयेगा?

गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे मंगलवार को अचानक जम्मू पहुंचे. उन्होंने सांबा क्षेत्र में सीमा पर तैनात बीएसएफ के कामकाज का मुआयना किया. गृहमंत्री का यह अचानक दौरा बताता है वहां कोई गंभीर बात है. हालांकि एक अटकल यह भी है कि केंद्र सरकार लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इसका भावनात्मक लाभ उठाना चाहती है. इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि नवाज शरीफ जेहादी गुटों से टकराव मोल लेना नहीं चाहते. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की पिछली सरकार ने और उसके पहले परवेज मुशर्रफ ने उनसे टकराव मोल लिया था. पीपीपी के प्रधानमंत्री युसुफ गिलानी को अलोकतांत्रिक तरीके से पद से हटना पड़ा और चुनाव लड़ने आये मुशर्रफ जेल में हैं.

एक अवधारणा है कि अगले साल अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के हटने के बाद जेहादी गिरोहों की मनोकामना कश्मीर में फिर से खूनी खेल खेलने की है. हाल में किश्तवाड़ में हुई हिंसा का संकेत है कि जम्मू के इस इलाके में उसी तरह जातीय सफाये की योजना है, जैसे श्रीनगर से पंडित भगाये गये थे. इसमें पाकिस्तानी जेहादियों का हाथ है या यह भारतीय राजनीति की अटकलबाजी है या दोनों बातें हैं? बताते हैं कि नरेंद्र मोदी के उदय के बाद से जम्मू में भाजपा की लोकप्रियता बढ़ी है.

नवाज पाक राजनीति में पहले बड़े नेता हैं, जिनकी व्यापारी पृष्ठभूमि है. पाक व्यापारी भारत से रिश्ते सुधारना चाहते हैं. भारत-पाक चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष एसएम मुनीर ने हाल में कहा कि राजनीतिक झटकों के बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए दोनों देशों की समृद्धि व शांति को बढ़ानेवाला रास्ता ही सफल होगा. हमें फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड के इतिहास से सीख लेनी चाहिए, जो करीब 60 साल पहले तक आपस में लड़ते रहे, पर अब साथ-साथ हैं. सीमा पर टकराव के बावजूद दोनों देशों ने कई शहरों में व्यापारियों के प्रवेश का और एक साल तक का वीजा देना शुरू किया है. दोनों मुल्कों के सामने विकल्प हैं कि बेवकूफों की तरह लड़ें या मिल कर समृद्धि के रास्ते खोजें.

गुरुदत्त की फिल्म ‘साहब, बीवी और गुलाम’ में हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने हवेली की घड़ियों में चाभी भरनेवाले घड़ीसाज की भूमिका अदा की थी. घड़ीसाज कहता था, वक्त की आवाज सुन ये हवेलियां भी नहीं रहेंगी. पाक में भारत-विरोध सबसे बड़ा ‘वोट बैंक’ है. हाल में रिलीज हुई पाकिस्तानी फिल्म ‘वॉर’ सफलता के झंडे गाड़ रही है. फिल्म में भारत को पाकिस्तानी तालिबान का आका बताया गया है! यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई के रिकार्ड तोड़ रही है. इसमें एक भारतीय महिला जासूस को इसलामाबाद में एक पुलिस अकादमी परिसर पर आतंकी हमले का जिम्मेवार दिखाया गया है. तालिबानी हिंसा से पीड़ित पाक नागरिकों को समझाया गया है कि जेहादी मानसिकता नहीं, भारत दोषी है. इसके विपरीत भारत में एक कॉमेडी फिल्म ‘वॉर छोड़ न यार’ सफल हो रही है. यह युद्ध मशीनरी की निर्थकता रेखांकित करती है. पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसेन हक्कानी कहते हैं कि पूरा पाकिस्तान जेहादी नहीं है. वहां भी एक नया मध्यवर्ग तैयार हो रहा है.

हाल में सानिया मिर्जा ने भोपाल में कहा, भारत और पाकिस्तान की संस्कृति, आदतें और रहन-सहन एक जैसा हैं. जब सब कुछ एक जैसा है, तो फिर रिश्तों में अंतर क्यों? इसके जवाब में फेसबुक पर किसी ने लिखा, यह बात अपनी ससुरालवालों से कहो, मायकेवालों से नहीं. पर ऐसे कितने लोग हैं जो दोनों तरफ की बातें समझते हों? दोनों देशों के रिश्ते जलेबी जैसे हैं. मीठे, लेकिन पेचदार. दक्षिण एशिया की बदहाली की वजह गलाकाट दुश्मनी भी है, जिसने इसे दुनिया के सबसे पिछड़े इलाकों में शामिल कर रखा है. जनवरी में होनेवाली हॉकी इंडिया लीग में इस बार भी पाक खिलाड़ी भाग नहीं लेंगे. यही हाल क्रिकेट में भी है.

इस साल जनवरी के पहले हफ्ते में भारतीय सैनिकों की गर्दन काटे जाने के बाद से सीमा पर तनाव बढ़ानेवाली घटनाएं लगातार हो रहीं हैं. कसाब और अफजल गुरु की फांसी, पाक जेल में सरबजीत सिंह की हत्या, उसके बाद जम्मू के जेल में पाक कैदी सनाउल्लाह की हत्या का दोनों देशों पर असर अलग-अलग पड़ा. पाक में यह चुनाव का साल था. अगले साल भारत में भी लोकसभा चुनाव है. पाकिस्तान की राजनीति में कश्मीर एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, और भारत के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न.

नवाज का कहना है, ‘जुलाई, 1999 में करगिल युद्ध के दौरान जब मैं अमेरिका गया, तब तत्कालीन राष्ट्रपति क्लिंटन से कहा था कि आप हाथ डालें तो कश्मीर मुद्दा सुलझ सकता है. आप पश्चिम एशिया पर खर्च होनेवाले अपने वक्त का दस फीसदी भी कश्मीर पर लगाते तो मसला सुलझ जाता.’ शरीफ के बयान के बाद सलमान खुर्शीद ने कहा, ‘भारत मध्यस्थता कभी स्वीकार नहीं करेगा.’ पर अमेरिका की भूमिका भी है. मध्यस्थ की नहीं, तो मददगार की. सच यह है कि बीते दस साल में कम-से-कम तीन मौके आये, जब दोनों देश समझौते के करीब थे. समझौता तब तक नहीं होगा, जब तक दोनों देशों की जनता और राजनीति की स्वीकृति नहीं होगी. इसके लिए संवाद जरूरी है. खेलकूद, गीत-संगीत, मनोरंजन और संस्कृति के रिश्ते इसमें मददगार होंगे. बेशक कुछ लोग रिश्तों की बेहतरी नहीं चाहते, पर उनके पास भी विकल्प नहीं हैं. उनकी समझ को पराजित होना है. अभी हो या कुछ दशक बाद. दुनिया भर के रिश्तों में तेजी से बदलाव आ रहा है. वक्त की आवाज सुनिये.

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