छठ पर ही घाटों की सफाई की याद

Published at :23 Oct 2013 2:44 AM (IST)
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छठ पर ही घाटों की सफाई की याद

बिहार-झारखंड दोनों ही राज्यों में छठ पास आते ही नदियों के घाट व बड़े तालाबों की याद आती है. साल भर घाटों की सुध लेने की फुरसत नहीं होती है. छठ के ही मौके पर स्वयंसेवी व स्वयंभू लोकहितकारी संगठन घाटों की सफाई का राग छेड़ते हैं. घाटों की सफाई के लिए जिला व अनुमंडल […]

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बिहार-झारखंड दोनों ही राज्यों में छठ पास आते ही नदियों के घाट व बड़े तालाबों की याद आती है. साल भर घाटों की सुध लेने की फुरसत नहीं होती है. छठ के ही मौके पर स्वयंसेवी व स्वयंभू लोकहितकारी संगठन घाटों की सफाई का राग छेड़ते हैं. घाटों की सफाई के लिए जिला व अनुमंडल स्तर पर कंटिजेंसी प्लान के फंड का उपयोग करने की परंपरा बिहार में चल रही है. झारखंड में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है.

वहां घाटों की सफाई का काम सार्वजनिक इंतजाम से किया जाता है. मतलब घाट से संबंधित थानेदार, संबंधित प्रखंड के बीडिओ, सीओ अपने स्तर पर सफाई करवाते हैं. घाटों की साफ-सफाई का कोई माकूल इंतजाम नहीं होता है. छठ के करीब एक महीने पहले से ही घाटों पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसजर्न का सिलसिला शुरू होता है, जो काली पूजा तक चलता रहता है. इस दौरान घाटों पर कचरे का अंबार लग जाता है. इस बार उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने गंगा व अन्य प्रमुख नदियों में मूर्तियों के बिसजर्न पर रोक लगाने का आदेश जारी किया. साथ ही कई स्वयंसेवी संगठनों ने नदी के घाटों की बदतर स्थिति को लेकर आम लोगों को संवेदनशील बनाने का काम किया है.

इसके कुछ बेहतर नतीजे भी सामने आये हैं. कुछ इसी तरह की पहल का इंतजार बिहार व झारखंड को भी है. पूजा-पाठ करने के लिए लाखों करोड़ों का चंदा वसूल करने वाली पूजा समितियों को घाटों की सफाई के काम के लिए भी आगे आने की जरूरत है. साथ ही सरकार को घाटों की सफाई के स्थायी इंतजाम के लिए किसी एक महकमे की जिम्मेवारी तय करनी होगी. अभी यह होता है कि घाट की सफाई का जिम्मा न तो सीधे तौर पर नगर निगम या स्थानीय निकाय के पास है और न ही बालू घाटों का ठेका करने वाले खनिज विकास निगम के पास.

ले-दे कर बचता है जिला प्रशासन, जिसके सामने हर साल छठ से पहले घाटों की सफाई का काम आ जाता है. सफाई मुक्कमल इंतजाम के अभाव में घाटों की स्थिति खराब होती जा रही है. इससे नदियों में प्रदूषण तो बढ़ता ही है और धार्मिक आस्थाएं भी आहत होती है. दोनों ही राज्यों में सरकार की ओर से विभागीय जिम्मेवारी तय करने के साथ जनभागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश होनी चाहिए.

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