संवेदनहीन सरकार और कलाकार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Jul 2015 5:41 AM (IST)
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किसान अपना ब्रांड एम्बेसडर स्वयं हैं. वह अपनी मेहनत और श्रम जल से देश का पेट भरता है. और हां उन अमिताभ बच्चन सरीखे सिनेमा के सितारों का भी पेट भरता है.लगान में किसानों की बात करने वाले अमीर खान हो या फिर सूर्यवंशम जैसी फिल्मों में किसानों की आवाज बनकर उभरने वाले अमिताभ बच्चन, […]
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किसान अपना ब्रांड एम्बेसडर स्वयं हैं. वह अपनी मेहनत और श्रम जल से देश का पेट भरता है. और हां उन अमिताभ बच्चन सरीखे सिनेमा के सितारों का भी पेट भरता है.लगान में किसानों की बात करने वाले अमीर खान हो या फिर सूर्यवंशम जैसी फिल्मों में किसानों की आवाज बनकर उभरने वाले अमिताभ बच्चन, सब के सब सिनेमा के परदे के सितारे हैं. इस देश की धरती के सितारे नहीं! देश के धरतीपुत्रों के लिए उनका कलेजा नहीं पसीजता है.
आंकड़ों पर गौर करें तो व्यवस्था से तंग आकर 1995 से 2013 के बीच देश के लगभग 296000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. उनकी औसत आमदनी लगभग 6500 रुपये प्रति महीने है. करोड़ों रुपये का कर्ज किसानों के ऊपर है. बारिश और सुखाड़ की चपेट में आकर किसानों की फसलें खराब हो जाती हैं. सरकारी सुविधाओं का फायदा उनको नहीं मिल पाता है.
दूसरों का पेट भरने वाला किसान भूखा सो जाता है. उस देश में किसान चैनल शुरू करना सरकार के लिए सराहनीय कदम है. लेकिन 45 करोड़ के बजट वाले किसान चैनल के लिए, महज एक विज्ञापन के लिए सरकार द्वारा 6 करोड़ 31 लाख खर्च कर देना बचकानी हरकत है. अगर यही पैसा किसानों को दिया जाता तो सैकड़ों किसानों के दिन बहुर जाते. उनके सूने जीवन में सुनहरे फसल लहलहा सकते थे. लेकिन सरकार ने विज्ञापन पर इतना पैसा खर्च कर देश के गरीब किसानों के साथ मजाक किया है.
सरकारी आंकड़ों में अमिताभ बच्चन उत्तर प्रेदेश में खरीदी अपनी जमीन के आधार पर किसान कहलाते हैं. लेकिन किसानों की दुर्दशा में वे उन गरीब किसानों के साथ कहीं खड़े नहीं हैं. किसानों के लिए अमिताभ बच्चन सरीखे ‘महान’ कलाकार एकाध घंटा निकालकर क्या मुफ्त विज्ञापन नहीं कर सकते?
चंद्रशेखर कुमार, खलारी, रांची
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